
टेक्नोलॉजी जगत के चर्चित उद्यमी एलन मस्क ने दावा किया है कि उनकी कंपनी न्यूरालिंक भविष्य में इंसानों और जानवरों के बीच संवाद का रास्ता खोल सकती है। इस दावे के साथ वर्ष 2028 का जिक्र भी सामने आया है। हालांकि यह अभी एक भविष्य की संभावना से जुड़ा दावा है न कि ऐसी सुविधा की पुष्टि जिसके जरिए लोग तय समय पर अपने पालतू जानवरों से बातचीत कर सकेंगे।
क्या है न्यूरालिंक और कैसे काम करती है इसकी तकनीक ?
न्यूरालिंक एक न्यूरोटेक्नोलॉजी कंपनी है जो मस्तिष्क और कंप्यूटर के बीच सीधा संपर्क स्थापित करने वाली तकनीक यानी ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस (BCI) विकसित कर रही है। हमारा मस्तिष्क न्यूरॉन्स के माध्यम से विद्युत संकेतों का इस्तेमाल करके शरीर को निर्देश देता है। वैज्ञानिक इन संकेतों को रिकॉर्ड करने और उनका विश्लेषण करने की तकनीक पर काम कर रहे हैं ताकि लकवे या गंभीर शारीरिक समस्याओं से जूझ रहे लोगों को डिजिटल उपकरणों का इस्तेमाल करने में मदद मिल सके। मस्तिष्क के संकेतों को समझकर कंप्यूटर पर कर्सर चलाना इसके संभावित उपयोगों में शामिल है। लेकिन मस्तिष्क के कुछ संकेतों को पहचानकर कंप्यूटर को निर्देश देना और किसी जानवर के विचारों को समझकर उससे बातचीत करना दो अलग-अलग वैज्ञानिक चुनौतियां हैं।
जानवरों से बातचीत कैसे संभव हो सकती है ?
कुत्ते, बिल्ली और दूसरे जानवर भी अपने आसपास की दुनिया को महसूस करते हैं। वे डर, खुशी तनाव और उत्सुकता जैसी अवस्थाओं को अलग-अलग व्यवहारों और शारीरिक संकेतों के जरिए व्यक्त करते हैं। नई तकनीक इस प्रक्रिया को आगे ले जा सकती है बशर्ते वैज्ञानिक मस्तिष्क की गतिविधियों और विशेष व्यवहार के बीच विश्वसनीय संबंध स्थापित कर सकें। हालांकि इसके लिए कई कठिन सवालों के जवाब तलाशने होंगे जैसे कि क्या किसी मस्तिष्क संकेत से यह पता लगाया जा सकता है कि जानवर भूखा है या क्या उस जानकारी को
इंसानों के लिए स्पष्ट शब्दों में बदला जा सकता है?
इंसानों और जानवरों के बीच संवाद का अर्थ जरूरी नहीं कि दोनों एक-दूसरे की भाषा बोलें। संभव है कि भविष्य में कोई तकनीक जानवर के व्यवहार या जैविक संकेतों के आधार पर यह अनुमान लगाने में मदद करे कि वह असहज है या डर रहा है लेकिन यह अनुमान और जानवर के वास्तविक विचारों को सीधे समझना एक जैसी बात नहीं है। मान लीजिए आपका कुत्ता दरवाजे के पास जाकर भौंकता है इसका कारण बाहर किसी की मौजूदगी टहलने की इच्छा या डर हो सकता है। केवल एक संकेत के आधार पर सटीक अर्थ तय करना मुश्किल है। इसी तरह बिल्ली का गिलास गिराना भी हमेशा किसी खास इरादे का प्रमाण नहीं होता इसके पीछे जिज्ञासा या खेलना भी हो सकता है। इसलिए पालतू जानवरों से इंसानों की तरह जवाब मिलने की उम्मीद करना अभी जल्दबाजी होगी।
इस दिशा में विज्ञान के सामने कई बड़ी चुनौतियां हैं। सबसे पहले मस्तिष्क के संकेतों का सही अर्थ समझना कठिन है क्योंकि हर गतिविधि का कोई एक निश्चित अर्थ नहीं होता। इसके अलावा प्रजातियों के बीच अंतर भी एक बड़ा मुद्दा है क्योंकि सभी जानवर एक ही तरीके से दुनिया को नहीं समझते। सुरक्षा और नैतिकता भी उतनी ही जरूरी हैं ताकि प्रयोगों के दौरान जानवरों को अनावश्यक परेशानी न हो।
क्या कुत्ता सचमुच इंसानों की भाषा में जवाब देगा ?
यही इस दावे का सबसे दिलचस्प और जटिल पहलू है। इंसानों और जानवरों के बीच संवाद का अर्थ जरूरी नहीं कि दोनों का एक-दूसरे की भाषा बोलना हो।
संभव है कि भविष्य में कोई तकनीक जानवर के व्यवहार या कुछ जैविक संकेतों के आधार पर यह अनुमान लगाने में मदद करे कि वह भूखा है असहज महसूस कर रहा है या किसी चीज से डर रहा है। लेकिन यह अनुमान और जानवर के वास्तविक विचारों को सीधे समझना एक जैसी बात नहीं है।
मान लीजिए आपका कुत्ता दरवाजे के पास जाकर भौंकता है। इसका कारण बाहर किसी व्यक्ति की मौजूदगी टहलने की इच्छा डर या कोई दूसरी प्रतिक्रिया हो सकती है। केवल एक संकेत के आधार पर उसका सटीक अर्थ तय करना मुश्किल है।
इसी तरह बिल्ली का गिलास गिराना भी हमेशा किसी खास इरादे का प्रमाण नहीं होता। उसके व्यवहार के पीछे जिज्ञासा खेलना ध्यान आकर्षित करना या आसपास की वस्तुओं के प्रति स्वाभाविक प्रतिक्रिया जैसे कई कारण हो सकते हैं।
इसलिए भले ही भविष्य में जानवरों के संकेतों को समझने वाली तकनीक विकसित हो जाए लेकिन उससे यह उम्मीद करना कि पालतू जानवर इंसानों की तरह सवालों के जवाब देंगे अभी जल्दबाजी होगी।
विज्ञान के सामने सबसे बड़ी चुनौतियां
जानवरों से संवाद स्थापित करने वाली किसी भी तकनीक को विकसित करने के लिए वैज्ञानिकों को कई स्तरों पर काम करना होगा।
पहली चुनौती है मस्तिष्क के संकेतों का सही अर्थ समझना। मस्तिष्क में होने वाली हर गतिविधि का कोई एक निश्चित अर्थ नहीं होता। अलग-अलग परिस्थितियों में समान संकेतों की व्याख्या अलग हो सकती है।
दूसरी चुनौती है प्रजातियों के बीच अंतर। कुत्ते बिल्लियां और दूसरे जानवर एक ही तरीके से दुनिया को नहीं समझते। उनकी इंद्रियां, व्यवहार और संचार के तरीके अलग-अलग होते हैं। इसलिए एक ही तकनीक सभी जानवरों पर समान रूप से काम करेगी यह मानना सही नहीं होगा।
तीसरी चुनौती है सुरक्षा और नैतिकता। यदि भविष्य में जानवरों के मस्तिष्क से जुड़े उपकरणों का इस्तेमाल किया जाता है, तो उनकी सेहत आराम और सुरक्षा को प्राथमिकता देनी होगी। किसी भी प्रयोग में यह सुनिश्चित करना जरूरी होगा कि जानवर को अनावश्यक दर्द या परेशानी न हो।
इसके अलावा वैज्ञानिकों को यह भी स्पष्ट करना होगा कि तकनीक से मिलने वाली जानकारी वास्तव में जानवर की मानसिक अवस्था को दर्शाती है या केवल उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर लगाया गया अनुमान है।
2028 की समयसीमा को लेकर क्या समझना चाहिए ?2028 तक इंसानों और जानवरों के बीच संवाद संभव होने के दावे को फिलहाल एक संभावित भविष्य के रूप में ही देखना चाहिए। जब तक कंपनी की ओर से स्पष्ट तकनीकी विवरण और प्रमाणित परीक्षण सामने नहीं आते, इसे निश्चित समयसीमा मानना उचित नहीं है।
यदि भविष्य में ऐसी तकनीक विकसित होती है, जो जानवरों की मानसिक अवस्थाओं को बेहतर ढंग से समझने में मदद करे, तो इससे पशु चिकित्सा और उनकी देखभाल के तरीकों में सुधार हो सकता है। कोई बीमार जानवर अपनी तकलीफ स्पष्ट रूप से व्यक्त नहीं कर पाता, और तकनीक इसमें मददगार हो सकती है। आखिरकार, अपने पालतू जानवर से सीधे सवाल पूछना और जवाब सुनना अभी कल्पना के करीब है, लेकिन विज्ञान यह दिखा रहा है कि मस्तिष्क और संचार को समझने के नए रास्ते तलाशे जा रहे हैं।
2028 तक इंसानों और जानवरों के बीच संवाद संभव होने के दावे को फिलहाल एक संभावित भविष्य के रूप में ही देखना चाहिए। जब तक कंपनी की ओर से स्पष्ट तकनीकी विवरण और प्रमाणित परीक्षण सामने नहीं आते इसे निश्चित समयसीमा मानना उचित नहीं है।
यदि भविष्य में ऐसी तकनीक विकसित होती है जो जानवरों की मानसिक अवस्थाओं को बेहतर ढंग से समझने में मदद करे तो इससे पशु चिकित्सा और उनकी देखभाल के तरीकों में सुधार हो सकता है। कोई बीमार जानवर अपनी तकलीफ स्पष्ट रूप से व्यक्त नहीं कर पाता और तकनीक इसमें मददगार हो सकती है। आखिरकार अपने पालतू जानवर से सीधे सवाल पूछना और जवाब सुनना अभी कल्पना के करीब है लेकिन विज्ञान यह दिखा रहा है कि मस्तिष्क और संचार को समझने के नए रास्ते तलाशे जा रहे हैं।
भविष्य में इंसान और जानवरों का रिश्ता बदल सकता है
यदि भविष्य में ऐसी तकनीक विकसित होती है जो जानवरों की जरूरतों और मानसिक अवस्थाओं को अधिक विश्वसनीय ढंग से समझने में मदद करे तो उसका उपयोग केवल जिज्ञासा शांत करने तक सीमित नहीं रहेगा। इससे पशु चिकित्सा जानवरों के व्यवहार के अध्ययन और उनकी देखभाल के तरीकों में भी सुधार की संभावनाएं पैदा हो सकती हैं। यदि तकनीक उसकी परेशानी के संकेतों को बेहतर ढंग से पहचानने में मदद करे तो पशु चिकित्सकों के लिए उसकी स्थिति समझना आसान हो सकता है। हालांकि यह भी भविष्य की संभावित उपयोगिता है कोई स्थापित उपलब्धि नहीं।
आखिरकार अपने पालतू जानवर से सीधे सवाल पूछना और उसका जवाब सुनना अभी कल्पना के करीब है। लेकिन विज्ञान की प्रगति यह जरूर दिखाती है कि मस्तिष्क व्यवहार और संचार को समझने के नए रास्ते तलाशे जा रहे हैं।