Tuesday, 15 September 202622:59 IST

तुकाराम मुंढे का ‘Mundhe Effect’: महाराष्ट्र में रंगीन स्ट्रीट फूड क्यों दिखने लगा बेरंग?

Updated: 15 Sep 2026, 13:36 IST · By Yk Pasha · 2 min read
तुकाराम मुंढे का ‘Mundhe Effect’: महाराष्ट्र में रंगीन स्ट्रीट फूड क्यों दिखने लगा बेरंग?
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सोशल मीडिया पर इन दिनों एक तस्वीर और उससे जुड़ा दावा काफी चर्चा में है—“One Man Changed Their Colours – That’s The Mundhe Effect”। तस्वीर में रंगीन जलेबी, लाल-नारंगी गोभी मंचूरियन और गुलाबी कॉटन कैंडी के साथ महाराष्ट्र के वरिष्ठ IAS अधिकारी तुकाराम मुंढे दिखाई दे रहे हैं। दावा यह है कि खाद्य सुरक्षा अभियान के बाद कई स्ट्रीट-फूड विक्रेता कृत्रिम रंगों का इस्तेमाल कम कर रहे हैं, जिसके कारण पहले चमकीले दिखने वाले खाद्य पदार्थ अब फीके या सफेद नजर आ रहे हैं।

मैंने इस दावे को महाराष्ट्र FDA और FSSAI की उपलब्ध आधिकारिक जानकारी तथा हाल की विश्वसनीय रिपोर्टों से क्रॉस-चेक किया है। मुख्य घटना वास्तविक है, लेकिन सोशल मीडिया पोस्ट में इसके कुछ हिस्से अतिरंजित हैं।

तुकाराम मुंढे कौन हैं और ‘Mundhe Effect’ क्या है?
तुकाराम मुंढे महाराष्ट्र कैडर के IAS अधिकारी हैं और मई 2026 से महाराष्ट्र के Food and Drug Administration (FDA) के Commissioner हैं। महाराष्ट्र FDA की आधिकारिक वेबसाइट पर भी उन्हें Commissioner के रूप में दर्ज किया गया है।

महाराष्ट्र FDA राज्य में खाद्य पदार्थों, दवाओं और कॉस्मेटिक्स की गुणवत्ता, सुरक्षा और नियामकीय अनुपालन सुनिश्चित करने वाली प्रमुख सरकारी संस्था है।

मुंढे के नेतृत्व में 2026 में खाद्य प्रतिष्ठानों के खिलाफ निरीक्षण और कार्रवाई काफी तेज हुई है। Reuters की रिपोर्ट के अनुसार, मई में पदभार संभालने के बाद उनके नेतृत्व में 3,000 से अधिक food-safety raids किए गए थे। इन कार्रवाइयों में स्ट्रीट वेंडर्स से लेकर रेस्टोरेंट, होटल और बड़ी food chains तक शामिल रहे।

इसी सख्त कार्रवाई के चलते सोशल मीडिया पर इस बदलाव को मजाकिया अंदाज में “Mundhe Effect” कहा जा रहा है। हालांकि, यह कोई सरकारी या आधिकारिक शब्द नहीं है, बल्कि सोशल मीडिया और मीडिया कवरेज में लोकप्रिय हुआ नाम है।

रंगीन खाना अचानक बेरंग क्यों दिखाई दे रहा है?
इस कहानी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा food colouring है।
भारत में खाद्य पदार्थों में हर प्रकार का रंग डालना कानूनी नहीं है। FSSAI के नियमों में केवल निर्धारित खाद्य रंगों को, निर्धारित खाद्य श्रेणियों और निर्धारित मात्रा में इस्तेमाल करने की अनुमति है। FSSAI के आधिकारिक दस्तावेजों में Carmoisine, Ponceau 4R, Erythrosine, Tartrazine, Sunset Yellow FCF, Indigo Carmine, Brilliant Blue FCF और Fast Green FCF जैसे अनुमत synthetic colours का उल्लेख है।

इसका मतलब यह है कि “artificial colour” और “illegal colour” एक ही चीज नहीं हैं।

कुछ synthetic food colours कानून के तहत निर्धारित परिस्थितियों में इस्तेमाल किए जा सकते हैं, जबकि कुछ दूसरे रंग खाद्य पदार्थों में अनुमत नहीं हैं।

यही अंतर इस पूरे मामले को समझने के लिए बेहद जरूरी है।

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कॉटन कैंडी गुलाबी से सफेद क्यों हो गई?
यह वायरल कहानी का सबसे आसानी से दिखाई देने वाला उदाहरण है।
कॉटन कैंडी या बुढ़िया के बाल मूल रूप से चीनी से बनाई जाती है। इसका प्राकृतिक आधार रंगहीन/सफेद होता है। गुलाबी, नीला या अन्य चमकीला रंग आमतौर पर अतिरिक्त colouring से आता है।

2026 में महाराष्ट्र में food-safety enforcement तेज होने के बाद कई स्थानों पर विक्रेताओं द्वारा रंग का इस्तेमाल कम करने या बंद करने की खबरें सामने आईं। इसके परिणामस्वरूप कॉटन कैंडी कुछ जगहों पर सफेद दिखाई देने लगी। इस बदलाव की तस्वीरें सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुईं।

इसलिए तस्वीर में दिख रहा white cotton candy वाला बदलाव वास्तविक घटना से जुड़ा है, लेकिन यह कहना कि महाराष्ट्र की हर कॉटन कैंडी अब सफेद हो गई है—सही नहीं होगा।

क्या गुलाबी कॉटन कैंडी में Rhodamine B होता है?
यहां सबसे ज्यादा सावधानी की जरूरत है।
Rhodamine B खाद्य पदार्थों में अनुमत food colour नहीं है। FSSAI के अपने food-additive analysis manual में Rhodamine B को उन unpermitted colours में गिना गया है जो कभी-कभी खाद्य पदार्थों में adulterant के रूप में पाए जाते हैं।

लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हर गुलाबी कॉटन कैंडी में Rhodamine B मौजूद होता है।

यह दावा बिना laboratory testing के नहीं किया जा सकता।

इसलिए सोशल मीडिया पर चलने वाला यह कथन कि “हर pink cotton candy में Rhodamine B होता है” तथ्यात्मक रूप से बहुत व्यापक और भ्रामक है।

सही बात यह है:
Rhodamine B खाद्य पदार्थों के लिए अनुमत रंग नहीं है और यदि किसी खाद्य नमूने में इसका इस्तेमाल पाया जाता है तो वह food-safety violation है।

जलेबी का रंग क्यों बदल रहा है?
जलेबी को देखकर लोग अक्सर मान लेते हैं कि उसका चमकीला नारंगी या केसरिया रंग पूरी तरह प्राकृतिक है। वास्तव में उसकी appearance कई चीजों से प्रभावित होती है—बेसन/मैदा या अन्य सामग्री, frying process, sugar syrup और इस्तेमाल किया गया colour।

हाल की रिपोर्टों और सोशल मीडिया पोस्टों में महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में जलेबी के अपेक्षाकृत कम रंगीन दिखाई देने की बात सामने आई है। इसे FDA के बढ़े हुए enforcement से जोड़ा जा रहा है।

लेकिन यहां भी यह कहना सही नहीं होगा कि:

FDA ने जलेबी का रंग बदल दिया।”

अधिक सटीक बात यह है कि खाद्य सुरक्षा नियमों के डर से/अनुपालन बढ़ने के कारण कुछ विक्रेताओं ने अनावश्यक या गैर-अनुमत colouring कम की हो सकती है, जिससे उत्पाद का पारंपरिक या हल्का रंग दिखाई देने लगा।

गोभी मंचूरियन लाल से फीका क्यों दिख रहा है?
गोभी मंचूरियन इस बहस का दूसरा बड़ा उदाहरण है।
भारत में मिलने वाला Gobi Manchurian अक्सर बहुत चमकीले लाल या नारंगी रंग में दिखाई देता है। कुछ विक्रेता sauce और food colouring के जरिए इसका रंग अधिक आकर्षक बनाते हैं।

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FDA के enforcement अभियान के दौरान खाद्य प्रतिष्ठानों में unsafe food practices, hygiene violations और regulatory non-compliance पर कार्रवाई की गई है। इससे अत्यधिक colouring का इस्तेमाल करने वाले कुछ विक्रेताओं पर भी दबाव बढ़ा है।

इसी कारण सोशल मीडिया पर अब “बिना लाल रंग वाला Manchurian” भी चर्चा का विषय बन गया है।

लेकिन यहां भी यह कहना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा कि हर लाल Gobi Manchurian में जहरीला chemical colour होता है।

किसी खास नमूने की पुष्टि केवल laboratory testing से की जा सकती है।

क्या तुकाराम मुंढे ने कोई नया कानून बनाया?
नहीं।

यह इस वायरल कहानी की सबसे महत्वपूर्ण fact-checking बातों में से एक है।

मुंढे की कार्रवाई मुख्यतः मौजूदा food-safety कानूनों और regulations के enforcement से जुड़ी है। Indian Express की रिपोर्ट के अनुसार महाराष्ट्र FDA का नया festival enforcement approach भी 2011 से लागू food-safety कानूनों के अनुपालन को सुनिश्चित करने पर केंद्रित है।

अर्थात—
मुंढे ने अचानक यह नियम नहीं बनाया कि जलेबी सफेद होनी चाहिए या कॉटन कैंडी गुलाबी नहीं हो सकती।

बल्कि उनका प्रशासन यह सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहा है कि खाद्य व्यवसाय मौजूदा सुरक्षा मानकों का पालन करें।

क्या हर artificial food colour खतरनाक है?
यह भी एक आम गलतफहमी है।
Artificial colour होना अपने-आप में “जहरीला” होने का प्रमाण नहीं है।

FSSAI कुछ synthetic food colours को विशेष खाद्य पदार्थों में निर्धारित सीमा के भीतर इस्तेमाल करने की अनुमति देता है। उदाहरण के लिए FSSAI के नियमों में Tartrazine, Sunset Yellow FCF, Ponceau 4R, Erythrosine आदि के लिए विभिन्न खाद्य श्रेणियों में निर्धारित maximum levels दिए गए हैं।

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समस्या तब होती है जब—
🔹अनुमत रंग की जगह गैर-अनुमत रंग इस्तेमाल हो,
🔹रंग गलत खाद्य श्रेणी में इस्तेमाल किया जाए,
🔹निर्धारित मात्रा से अधिक इस्तेमाल हो,
🔹industrial dye को food colour की तरह इस्तेमाल किया जाए,
🔹या खाद्य पदार्थ में मिलावट की जाए।

इसलिए “रंग = जहर” कहना भी गलत है और “हर चमकीला रंग सुरक्षित है” कहना भी गलत है।

मुंढे की कार्रवाई केवल रंगों तक सीमित नहीं है

यह अभियान सिर्फ जलेबी और कॉटन कैंडी का मामला नहीं है।

महाराष्ट्र FDA की हालिया कार्रवाइयों में खाद्य प्रतिष्ठानों की स्वच्छता, खाद्य भंडारण, कीटों की मौजूदगी, expired food, food licence और food-handling practices जैसी कई चीजों की जांच शामिल है।

हाल की एक कार्रवाई में ठाणे क्षेत्र में 11 food establishments पर कार्रवाई और लगभग ₹20.48 लाख मूल्य की सामग्री जब्त किए जाने की रिपोर्ट सामने आई। निरीक्षण में स्वच्छता की गंभीर कमियां, कीटों की मौजूदगी और पुराने इस्तेमाल किए गए खाद्य तेल जैसी समस्याएं बताई गईं।

इससे स्पष्ट है कि “Mundhe Effect” वास्तव में केवल food colour campaign नहीं, बल्कि व्यापक food-safety enforcement का हिस्सा है।

3,000 से ज्यादा छापों का क्या मतलब है?
Reuters के अनुसार, मई 2026 में FDA Commissioner बनने के बाद मुंढे के नेतृत्व में 3,000 से अधिक food-safety raids किए गए। कार्रवाई में छोटे street vendors से लेकर बड़े restaurants और food chains तक शामिल रहे।

इतनी बड़ी संख्या में inspections का असर केवल जुर्माने या लाइसेंस कार्रवाई तक सीमित नहीं रहता।

जब दुकानदारों और restaurant operators को यह पता हो कि inspection हो सकता है, तो वे—

🔹खाद्य सामग्री ढककर रखने,
🔹साफ-सफाई बनाए रखने,
🔹expired food हटाने,
🔹licence compliance,
🔹food storage,
🔹kitchen hygiene
🔹और unauthorized additives/colours

पर अधिक ध्यान दे सकते हैं।

यही वजह है कि कुछ लोगों को इसका असर सीधे खाने के रंग और presentation में दिखाई दे रहा है।

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क्या यह अभियान विवादों से पूरी तरह मुक्त है?

नहीं।

मुंढे की सख्त कार्रवाई की जहां काफी प्रशंसा हुई है, वहीं कुछ व्यवसायियों और अन्य समूहों की ओर से over-enforcement या selective action जैसे आरोप भी सामने आए हैं। Reuters ने भी उनके अभियान के साथ जुड़े कानूनी और आलोचनात्मक पहलुओं का उल्लेख किया है।

हाल ही में कुछ धार्मिक संगठनों ने भी खाद्य-सुरक्षा नियमों के लागू होने को लेकर आपत्तियां दर्ज कराई हैं और समान रूप से नियम लागू किए जाने की मांग की है। यह एक अलग प्रशासनिक और सामाजिक बहस है।

इसलिए किसी भी निष्कर्ष में प्रशंसा और आलोचना—दोनों पक्षों को ध्यान में रखना जरूरी है।

असली संदेश क्या है?
इस पूरी कहानी को केवल “मुंढे ने रंगीन खाना बेरंग कर दिया” के रूप में देखना गलत होगा।

असल मुद्दा इससे कहीं बड़ा है।

खाद्य पदार्थ का चमकीला रंग उसकी गुणवत्ता की गारंटी नहीं है।

एक जलेबी ज्यादा नारंगी हो सकती है, कॉटन कैंडी ज्यादा गुलाबी हो सकती है और मंचूरियन ज्यादा लाल हो सकता है—लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि वह अधिक स्वादिष्ट या सुरक्षित है।

दूसरी तरफ, फीका या सफेद दिखने वाला भोजन भी अपने-आप सुरक्षित नहीं हो जाता।

सुरक्षा का फैसला रंग देखकर नहीं, बल्कि ingredients, hygiene, manufacturing practices, permitted additives और जरूरत पड़ने पर laboratory testing के आधार पर किया जाना चाहिए।

महाराष्ट्र में तुकाराम मुंढे के नेतृत्व में चल रही कार्रवाई का सबसे बड़ा प्रभाव शायद यही है कि उसने आम उपभोक्ता को यह सवाल पूछने पर मजबूर किया है—

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“खाना इतना रंगीन क्यों है और उसमें यह रंग आया कहां से?”
और food safety के नजरिए से यही सवाल सबसे महत्वपूर्ण है।

निष्कर्षतः, वायरल तस्वीर में दिख रहा “Mundhe Effect” एक वास्तविक enforcement trend पर आधारित है, लेकिन तस्वीर के संदेश को शाब्दिक रूप से नहीं लेना चाहिए। महाराष्ट्र FDA का अभियान किसी एक व्यक्ति द्वारा रंगों को “बदलने” की कहानी नहीं, बल्कि मौजूदा खाद्य-सुरक्षा नियमों को ज्यादा सख्ती से लागू करने की व्यापक कोशिश है। महाराष्ट्र FDA स्वयं अपनी भूमिका को सुरक्षित और compliant food सुनिश्चित करने वाली राज्य की प्रमुख regulatory authority बताता है।

आधिकारिक स्रोत: [Maharashtra Food & Drug Administration](https://fda.maharashtra.gov.in/?utm_source=chatgpt.com) और [FSSAI](https://www.fssai.gov.in/?utm_source=chatgpt.com)

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