Monday, 26 October 202621:11 IST

प्रशांत महासागर में क्यों बढ़ रही है गर्मी? अल-नीनो, वैश्विक तापमान और 2026–27 में मौसम पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव

Updated: 25 Oct 2026, 07:22 IST · By Yk Pasha · 1 min read
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प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान बढ़ना दुनिया भर के मौसम वैज्ञानिकों के लिए महत्वपूर्ण विषय है। इसका असर केवल समुद्र तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वायुमंडलीय परिसंचरण, वर्षा, सूखा, बाढ़, कृषि और समुद्री पारिस्थितिकी पर भी पड़ सकता है। अक्टूबर 2026 में विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) और अमेरिका के राष्ट्रीय महासागरीय एवं वायुमंडलीय प्रशासन (NOAA) ने प्रशांत महासागर में मजबूत होते अल-नीनो की ओर संकेत किया है। उपलब्ध आधिकारिक पूर्वानुमानों के अनुसार, 2026 के अंतिम महीनों में यह घटना काफी शक्तिशाली हो सकती है और इसका प्रभाव 2027 की शुरुआत तक बना रह सकता है।

हालांकि, यह समझना आवश्यक है कि समुद्र के तापमान में वृद्धि का अर्थ यह नहीं है कि दुनिया के हर हिस्से में एक जैसी गर्मी, सूखा या बाढ़ आएगी। अलग-अलग क्षेत्रों में इसका प्रभाव स्थानीय मौसम, समुद्री परिस्थितियों और अन्य जलवायु कारकों पर निर्भर करता है।

1. प्रशांत महासागर में तापमान क्यों बढ़ रहा है ?
प्रशांत महासागर पृथ्वी का सबसे बड़ा महासागर है। इसके उष्णकटिबंधीय हिस्से में समुद्र की सतह का तापमान वैश्विक मौसम प्रणाली को प्रभावित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। सामान्य परिस्थितियों में पूर्वी प्रशांत से पश्चिमी प्रशांत की ओर चलने वाली व्यापारिक हवाएं गर्म सतही पानी को एशिया और इंडोनेशिया के आसपास के क्षेत्रों की ओर धकेलती हैं। इसके कारण दक्षिण अमेरिका के निकट पूर्वी प्रशांत में अपेक्षाकृत ठंडा, गहरे समुद्र से ऊपर आने वाला पानी सतह के तापमान को नियंत्रित करने में मदद करता है।

जब ये हवाएं कमजोर पड़ती हैं, तो गर्म पानी मध्य और पूर्वी प्रशांत की ओर फैल सकता है। इससे समुद्र की सतह का तापमान बढ़ता है और समुद्र तथा वायुमंडल के बीच ऊर्जा का आदान-प्रदान बदल जाता है। इस प्रक्रिया के कारण बारिश वाले क्षेत्रों का स्थान बदल सकता है और दूर-दराज के देशों में भी मौसम के सामान्य पैटर्न प्रभावित हो सकते हैं।

NOAA के अनुसार, समुद्र के तापमान, हवाओं, वायुदाब और वर्षा के बीच होने वाली इस परस्पर क्रिया को समझना अल-नीनो की पहचान तथा उसके प्रभावों का पूर्वानुमान लगाने के लिए आवश्यक है।

2. क्या है अल-नीनो ?
अल-नीनो प्रशांत महासागर के उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में समुद्र की सतह के असामान्य रूप से गर्म होने से जुड़ी प्राकृतिक जलवायु घटना है। यह अल-नीनो-दक्षिणी दोलन यानी ENSO (El Niño–Southern Oscillation) का गर्म चरण है। ENSO की तीन अवस्थाएं होती हैं—अल-नीनो, ला-नीना और तटस्थ अवस्था।

ला-नीना के दौरान मध्य और पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत का पानी सामान्य से ठंडा रहता है, जबकि तटस्थ अवस्था में स्थितियां सामान्य औसत के आसपास होती हैं।

अल-नीनो और ला-नीना केवल समुद्र के तापमान में बदलाव नहीं हैं। इनके साथ हवाओं, वायुदाब, बादलों और वर्षा के पैटर्न में भी बदलाव होते हैं। यही कारण है कि इन घटनाओं का प्रभाव समुद्र से हजारों किलोमीटर दूर स्थित क्षेत्रों तक पहुंच सकता है।

NOAA के अनुसार, ENSO की घटनाएं औसतन कुछ वर्षों के अंतराल पर विकसित होती हैं और सामान्यतः कई महीनों तक बनी रह सकती हैं। हालांकि, प्रत्येक घटना की अवधि, तीव्रता और प्रभाव अलग-अलग होते हैं।

3. अक्टूबर 2026 में आधिकारिक पूर्वानुमान क्या कहता है ?
विश्व मौसम विज्ञान संगठन ने 8 अक्टूबर 2026 को जारी अपने वैश्विक मौसमी जलवायु अपडेट में बताया कि मध्य और पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत में समुद्र की सतह का तापमान बढ़ने का अनुमान है। संगठन के अनुसार, अक्टूबर–दिसंबर 2026 के दौरान अल-नीनो के और मजबूत होने की संभावना है। इससे दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों में तापमान और वर्षा के सामान्य पैटर्न प्रभावित हो सकते हैं।

WMO के इसी अपडेट में नीनो 3.4 क्षेत्र के तापमान की विसंगति जून 2026 में सामान्य से लगभग 1.6 डिग्री सेल्सियस अधिक और अगस्त में लगभग 2.5 डिग्री सेल्सियस अधिक बताई गई। अक्टूबर–दिसंबर के लिए इस क्षेत्र में औसत विसंगति लगभग 3.7 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचने का पूर्वानुमान दिया गया था। यह पूर्वानुमान है, पहले से दर्ज हो चुका वास्तविक परिणाम नहीं।

अमेरिका के NOAA जलवायु पूर्वानुमान केंद्र ने 8 अक्टूबर 2026 की ENSO रिपोर्ट में भी अल-नीनो के मजबूत होने की पुष्टि की। रिपोर्ट के अनुसार, जनवरी–मार्च 2027 तक मजबूत से बहुत मजबूत अल-नीनो बने रहने की संभावना अधिक थी। हालांकि, मौसम संबंधी पूर्वानुमानों को समय-समय पर नए आंकड़ों के आधार पर संशोधित किया जाता है।

इन आधिकारिक आकलनों से स्पष्ट है कि प्रशांत महासागर में असामान्य गर्मी और अल-नीनो की स्थिति गंभीरता से निगरानी किए जाने वाले विषय हैं। फिर भी, भविष्य में बनने वाली प्रत्येक मौसमी परिस्थिति के बारे में निश्चित दावा करना वैज्ञानिक दृष्टि से उचित नहीं होगा।

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4. क्या अल-नीनो से दुनिया भर में गर्मी बढ़ती है ?
अल-नीनो वैश्विक तापमान को प्रभावित कर सकता है। प्रशांत महासागर में जमा ऊष्मा और वायुमंडल के बीच ऊर्जा का आदान-प्रदान बदलने से वैश्विक तापमान के औसत में अस्थायी वृद्धि हो सकती है। इसके कारण पहले से चल रहे वैश्विक तापवृद्धि के प्रभाव और अधिक स्पष्ट दिखाई दे सकते हैं।

हालांकि, वैश्विक तापमान बढ़ने के पीछे केवल अल-नीनो जिम्मेदार नहीं है। मानव गतिविधियों से उत्सर्जित ग्रीनहाउस गैसें, विशेषकर कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन, दीर्घकालिक वैश्विक तापवृद्धि के प्रमुख कारण हैं। अल-नीनो प्राकृतिक जलवायु परिवर्तनशीलता का हिस्सा है, जो किसी वर्ष या कुछ वर्षों के दौरान तापमान को ऊपर या नीचे प्रभावित कर सकता है।

इसलिए यदि 2026–27 के दौरान कई क्षेत्रों में असामान्य गर्मी दर्ज होती है, तो उसके कारणों का आकलन करते समय अल-नीनो, दीर्घकालिक वैश्विक तापवृद्धि और स्थानीय मौसम परिस्थितियों—तीनों पर विचार करना आवश्यक होगा।

5. सूखा और बाढ़ का खतरा कैसे बढ़ सकता है ?
अल-नीनो के दौरान वर्षा के सामान्य वितरण में बदलाव आ सकता है। कुछ क्षेत्रों में बादल और बारिश बढ़ सकते हैं, जबकि दूसरे क्षेत्रों में लंबे समय तक कम वर्षा होने की आशंका बढ़ सकती है।

उदाहरण के लिए, ऐतिहासिक रूप से अल-नीनो की कुछ घटनाओं के दौरान पेरू और इक्वाडोर के कुछ हिस्सों में भारी वर्षा तथा बाढ़ देखी गई है। इसके विपरीत, इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया के कुछ हिस्सों में सूखे की परिस्थितियां विकसित हुई हैं।

इन प्रभावों के पीछे समुद्र की सतह के तापमान के साथ वायुमंडलीय परिसंचरण में होने वाला बदलाव है। गर्म पानी के ऊपर हवा के उठने, बादल बनने और वर्षा होने के स्थान में परिवर्तन हो सकता है। इससे विभिन्न महाद्वीपों के मौसमी पैटर्न प्रभावित होते हैं।

लेकिन इन उदाहरणों का अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक अल-नीनो घटना के दौरान उन्हीं क्षेत्रों में निश्चित रूप से बाढ़ या सूखा आएगा। किसी विशेष स्थान पर बारिश कितनी होगी, यह स्थानीय परिस्थितियों और अन्य जलवायु प्रणालियों पर भी निर्भर करता है।

6. भारत के मानसून पर क्या प्रभाव पड़ सकता है ?
भारत के लिए अल-नीनो विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि देश की कृषि और जल उपलब्धता का बड़ा हिस्सा मानसूनी वर्षा पर निर्भर करता है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार, अल-नीनो की स्थिति सामान्यतः भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून की वर्षा कम होने की संभावना से जुड़ी रही है।

हालांकि, अल-नीनो और भारतीय मानसून के बीच संबंध पूरी तरह निश्चित नहीं है। भारतीय महासागर द्विध्रुव (Indian Ocean Dipole या IOD), हिंद महासागर की सतह का तापमान, क्षेत्रीय मौसम प्रणालियां और अन्य कारक भी मानसून को प्रभावित करते हैं। इसलिए मजबूत अल-नीनो होने पर भी यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि पूरे भारत में हर जगह सामान्य से कम वर्षा ही होगी।

अल-नीनो का प्रभाव मानसून के अलग-अलग महीनों में अलग हो सकता है। ऐतिहासिक आंकड़ों में विशेष रूप से मानसून के उत्तरार्ध, यानी सितंबर की वर्षा के साथ इसका संबंध महत्वपूर्ण पाया गया है।

यदि किसी मौसम में मानसूनी वर्षा कम रहती है, तो वर्षा पर निर्भर कृषि, जलाशयों, भूजल और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ सकता है। लेकिन किसी विशेष वर्ष में फसल उत्पादन या जल संकट का आकलन करने के लिए वास्तविक वर्षा, मिट्टी की नमी, सिंचाई सुविधाओं और क्षेत्रीय आंकड़ों को देखना आवश्यक है।

7. खेती और खाद्य सुरक्षा पर संभावित असर
कृषि मौसम पर निर्भर क्षेत्र है। लंबे समय तक बारिश कम होने से मिट्टी की नमी घट सकती है, सिंचाई की मांग बढ़ सकती है और कुछ फसलों की पैदावार प्रभावित हो सकती है। दूसरी ओर, अत्यधिक वर्षा होने पर खेतों में जलभराव, मिट्टी का कटाव और फसल खराब होने का जोखिम बढ़ सकता है।

अल-नीनो से जुड़े मौसम बदलावों के कारण कुछ देशों में खाद्यान्न उत्पादन और कृषि वस्तुओं की आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका रहती है। यदि उत्पादन घटता है और परिवहन या आपूर्ति शृंखला भी प्रभावित होती है, तो कुछ बाजारों में कीमतों पर दबाव पड़ सकता है।

हालांकि, खाद्य पदार्थों की कीमतें केवल मौसम से निर्धारित नहीं होतीं। उत्पादन, सरकारी नीतियां, भंडारण, आयात-निर्यात, परिवहन लागत और बाजार की मांग भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए अल-नीनो के आधार पर खाद्य महंगाई को निश्चित परिणाम के रूप में प्रस्तुत करना सही नहीं होगा।

8. समुद्री जीवों और मछली उद्योग पर प्रभाव
अल-नीनो समुद्र की धाराओं और गहरे समुद्र से ठंडे, पोषक तत्वों से भरपूर पानी के ऊपर आने की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है। विशेषकर दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी तट के पास ऐसी परिस्थितियां मछलियों के भोजन और वितरण में बदलाव ला सकती हैं।

जब समुद्र में पोषक तत्वों की उपलब्धता बदलती है, तो प्लवक, मछलियों और उनसे जुड़े अन्य जीवों पर असर पड़ सकता है। इससे कुछ क्षेत्रों में मछली पकड़ने वाले समुदायों और समुद्री खाद्य उद्योग को आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।

हालांकि, प्रभाव की दिशा और तीव्रता समुद्री क्षेत्र, प्रजातियों तथा घटना की विशेष परिस्थितियों पर निर्भर करती है। सभी समुद्री पारिस्थितिक तंत्रों पर एक जैसा प्रभाव पड़ना आवश्यक नहीं है।

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9. आगे क्या देखना जरूरी होगा ?
2026–27 के दौरान स्थिति को समझने के लिए वैज्ञानिक समुद्र की सतह के तापमान, समुद्र के भीतर ऊष्मा, व्यापारिक हवाओं, वायुदाब और वर्षा के आंकड़ों की निगरानी करेंगे। NOAA और WMO जैसे संस्थान नियमित अपडेट जारी करते हैं, जबकि भारत में IMD मानसून और मौसमी परिस्थितियों से संबंधित पूर्वानुमान उपलब्ध कराता है।

किसी संभावित जलवायु जोखिम की सही जानकारी के लिए केवल सोशल मीडिया ग्राफिक्स या वायरल दावों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। आधिकारिक पूर्वानुमान की तारीख, उसके क्षेत्रीय दायरे और उसमें बताई गई संभावना को समझना आवश्यक है। मौसम की चेतावनी जारी होने पर स्थानीय प्रशासन और मौसम विभाग के निर्देशों का पालन करना भी महत्वपूर्ण है।

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