
दिल की धड़कन सामान्य रूप से एक जटिल विद्युत प्रणाली द्वारा नियंत्रित होती है। जब इस प्रणाली में गड़बड़ी आती है और हृदय बहुत धीमी गति से धड़कने लगता है या उसकी लय असामान्य हो जाती है, तब कुछ मरीजों के लिए पेसमेकर की आवश्यकता पड़ सकती है। पारंपरिक पेसमेकर शरीर के अंदर प्रत्यारोपित किया जाता है और हृदय को विद्युत संकेत देकर उसकी धड़कन को नियंत्रित करता है।
अब वैज्ञानिकों ने ऐसी तकनीक विकसित की है जो भविष्य में इस प्रक्रिया को कम आक्रामक बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकती है। Massachusetts Institute of Technology (MIT) के इंजीनियरों और अन्य संस्थानों के शोधकर्ताओं ने एक wearable, non-invasive ultrasound pacemaker विकसित किया है, जिसे त्वचा के ऊपर एक छोटे स्टिकर की तरह लगाया जा सकता है। यह तकनीक अल्ट्रासाउंड तरंगों के माध्यम से हृदय की कोशिकाओं को उत्तेजित करने का प्रयास करती है। शोध के परिणाम 2 जून 2026 को Nature Biomedical Engineering में प्रकाशित हुए।
क्या है यह नई तकनीक ?
शोधकर्ताओं ने जिस प्रणाली को विकसित किया है, उसे Non-Invasive Ultrasound Pacemaker (NUP) कहा गया है। इसका मूल विचार यह है कि हृदय को विद्युत रूप से सीधे उत्तेजित करने के बजाय अल्ट्रासाउंड ऊर्जा का इस्तेमाल करके हृदय की कोशिकाओं में एक विशेष प्रतिक्रिया उत्पन्न की जाए।
MIT के अनुसार, इस उपकरण का मुख्य हिस्सा लगभग डाक टिकट के आकार के एक छोटे स्टिकर जैसा बनाया गया है। इसमें छोटे-छोटे अल्ट्रासाउंड ट्रांसड्यूसर लगे होते हैं, जो शरीर के बाहर से अल्ट्रासाउंड पल्स भेज सकते हैं। स्टिकर में इस्तेमाल विशेष हाइड्रोजेल त्वचा से चिपकने में मदद करता है और अल्ट्रासाउंड तरंगों को शरीर के भीतर जाने देता है।
हालांकि, सोशल मीडिया में इसे केवल एक छोटी चिप जो अपने आप दिल को ठीक कर देती है कहना सही नहीं होगा। वास्तविक शोध प्रणाली में स्टिकर के साथ बैटरी और इलेक्ट्रॉनिक्स वाला एक छोटा बाहरी उपकरण भी शामिल था। इसलिए तस्वीर में दिखाई देने वाला छोटा पैच पूरी प्रणाली का अकेला हिस्सा नहीं है।
अल्ट्रासाउंड दिल की धड़कन को कैसे प्रभावित करता है ?
इस शोध की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता sonogenetics है। यह एक अपेक्षाकृत नई तकनीक है, जिसमें कोशिकाओं को इस तरह संशोधित किया जाता है कि वे ध्वनि, विशेष रूप से अल्ट्रासाउंड, के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाएं।
शोधकर्ताओं ने हृदय की कोशिकाओं में MscL-G22S नामक mechanosensitive ion channel से संबंधित आनुवंशिक बदलाव का इस्तेमाल किया। जब अल्ट्रासाउंड इन संशोधित कोशिकाओं पर पड़ता है, तो ये आयन चैनल सक्रिय हो सकते हैं। इसके परिणामस्वरूप कैल्शियम आयनों का कोशिका में प्रवेश होता है और हृदय की मांसपेशी कोशिका के संकुचन की प्रक्रिया शुरू हो सकती है।
सरल शब्दों में समझें तो वैज्ञानिकों ने हृदय की कोशिकाओं को अल्ट्रासाउंड के प्रति अधिक “संवेदनशील” बनाने का तरीका विकसित किया और फिर शरीर के बाहर से भेजी गई अल्ट्रासाउंड ऊर्जा का इस्तेमाल करके उन कोशिकाओं की गतिविधि को नियंत्रित करने का प्रयास किया।

प्रयोगों में क्या परिणाम मिले ?
यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस तकनीक के शुरुआती परिणाम प्रयोगशाला और पशु मॉडल में मिले हैं, न कि सामान्य मरीजों के उपचार में।
शोधकर्ताओं ने सबसे पहले आनुवंशिक रूप से संशोधित मानव हृदय कोशिकाओं पर प्रयोग किया। इन कोशिकाओं में अल्ट्रासाउंड देने पर कैल्शियम संकेतों और कोशिका-संकुचन में नियंत्रित प्रतिक्रिया देखी गई।
इसके बाद चूहों पर प्रयोग किए गए। शोध में बताया गया कि अल्ट्रासाउंड पेसमेकर ने कुछ arrhythmia models में हृदय की असामान्य लय को नियंत्रित किया और sinus rhythm बहाल करने में मदद की। शोधकर्ताओं ने अलग-अलग cardiac chambers को लक्षित करके pacing भी प्रदर्शित की। रिपोर्ट के अनुसार stimulation की spatial precision 1 मिलीमीटर से कम तक पहुंची और frequency control 9 Hz तक प्रदर्शित किया गया।
एक और महत्वपूर्ण परिणाम यह था कि शोधकर्ताओं ने चूहों में इस प्रणाली की दीर्घकालिक सुरक्षा का परीक्षण किया। Nature Biomedical Engineering के शोध के अनुसार, दैनिक गतिविधियों के दौरान 8 महीने तक सुरक्षा का परीक्षण किया गया।
क्या यह तकनीक इंसानों पर इस्तेमाल हो चुकी है ?
नहीं। यही इस खबर का सबसे महत्वपूर्ण तथ्यात्मक स्पष्टीकरण है।
इस शोध को यह कहकर प्रस्तुत करना कि MIT ने इंसानों के लिए तैयार पेसमेकर बना दिया है सही नहीं होगा। उपलब्ध शोध में मानव मरीजों पर इस wearable pacemaker का clinical trial या सामान्य चिकित्सा उपचार के रूप में इस्तेमाल प्रदर्शित नहीं किया गया है।
मानव हृदय कोशिकाओं पर प्रयोग in vitro, यानी प्रयोगशाला में किए गए थे। इसके अलावा शोधकर्ताओं ने बड़े आकार के शरीर में तकनीक की व्यवहार्यता समझने के लिए ex vivo porcine models का भी इस्तेमाल किया। Nature के अनुसार, इन प्रयोगों का उद्देश्य human-scale application की feasibility का आकलन करना था।
इसलिए वर्तमान स्थिति को प्रयोगात्मक शोध और भविष्य की संभावित चिकित्सा तकनीक के रूप में समझना अधिक उचित है।
इसमें gene therapy की भूमिका क्यों महत्वपूर्ण है ?

इस तकनीक का एक चुनौतीपूर्ण हिस्सा यह है कि हृदय की कोशिकाओं को अल्ट्रासाउंड के प्रति अधिक संवेदनशील बनाने के लिए आनुवंशिक बदलाव की आवश्यकता पड़ती है।
MIT News के अनुसार, शोधकर्ताओं ने भविष्य की संभावित clinical application में एक बार दिए जाने वाले gene-therapy आधारित उपचार की कल्पना की है, जिसके बाद हृदय की कोशिकाएं अल्ट्रासाउंड संकेतों के प्रति अधिक संवेदनशील हो सकती हैं। लेकिन यह अभी एक शोधकर्ताओं द्वारा परिकल्पित भविष्य की दिशा है, वर्तमान मरीजों के लिए उपलब्ध उपचार नहीं।
यही कारण है कि इस तकनीक को अभी पारंपरिक पेसमेकर का तत्काल विकल्प कहना जल्दबाजी होगी।
पारंपरिक पेसमेकर से अंतर क्या है ?
पारंपरिक पेसमेकर शरीर में प्रत्यारोपित किया जाता है और विद्युत impulses के माध्यम से हृदय की धड़कन को नियंत्रित करता है। यह एक स्थापित चिकित्सा तकनीक है और लंबे समय से हृदय की कुछ rhythm disorders के उपचार में इस्तेमाल की जाती है। दूसरी ओर, नया NUP शरीर के बाहर से अल्ट्रासाउंड के माध्यम से stimulation देने की अवधारणा पर आधारित है।
यदि भविष्य के clinical trials में यह तकनीक सुरक्षित और प्रभावी साबित होती है, तो इसके संभावित लाभों में surgical implantation से बचने और शरीर में स्थायी hardware की आवश्यकता कम करने जैसी संभावनाएं शामिल हो सकती हैं। लेकिन इन संभावित लाभों की पुष्टि अभी बड़े मानव clinical trials से होनी बाकी है।
क्या यह भविष्य में “wearable pacemaker” बन सकता है ?
शोधकर्ताओं का दीर्घकालिक लक्ष्य इसी दिशा में है। MIT के अनुसार, टीम वर्तमान prototype को और छोटा, अधिक integrated, स्थिर और लंबे समय तक पहनने के लिए उपयुक्त बनाने पर काम कर रही है। शोधकर्ताओं ने यह भी संभावना बताई है कि भविष्य में ultrasound imaging और stimulation को एक ही wearable system में जोड़ा जा सकता है। इससे एक ऐसा closed-loop system विकसित करने की संभावना बन सकती है जो शरीर के भीतर की गतिविधियों को monitor करने और जरूरत के अनुसार stimulation देने दोनों का काम करे।
हालांकि, यह अभी भविष्य की research direction है, बाजार में उपलब्ध चिकित्सा उपकरण नहीं।
इस खोज का महत्व क्या है ?
इस शोध की खासियत केवल एक छोटा पेसमेकर बनाना नहीं है। इसमें wearable electronics, ultrasound, bioengineering, sonogenetics और cardiac pacing जैसी कई वैज्ञानिक अवधारणाओं को एक साथ जोड़ा गया है।
Ultrasound पहले से ही चिकित्सा क्षेत्र में शरीर के अंदर की संरचनाओं की imaging के लिए व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है। हाल के शोध में wearable ultrasound systems को cardiovascular monitoring के लिए भी विकसित किया जा रहा है।
नई NUP तकनीक इसी व्यापक क्षेत्र को एक कदम आगे ले जाकर ultrasound को केवल monitoring के बजाय targeted stimulation के लिए इस्तेमाल करने का प्रयास करती है।

MIT और सहयोगी संस्थानों द्वारा विकसित यह wearable non-invasive ultrasound pacemaker हृदय की धड़कन को नियंत्रित करने की भविष्य की तकनीकों पर शोध में एक महत्वपूर्ण प्रायोगिक उपलब्धि है। शोध में मानव हृदय कोशिकाओं, चूहों और ex vivo बड़े पशु मॉडल में promising परिणाम प्रदर्शित किए गए हैं। विशेष रूप से ultrasound-responsive ion channels के माध्यम से हृदय की कोशिकाओं को नियंत्रित करने की क्षमता इस तकनीक को अलग बनाती है।
लेकिन इसे अभी इंसानों के लिए तैयार या स्वीकृत पेसमेकर नहीं कहा जा सकता। वर्तमान प्रमाण मुख्यतः laboratory, animal और ex vivo experiments पर आधारित हैं। मानव मरीजों में इसकी वास्तविक सुरक्षा, प्रभावशीलता, gene-therapy संबंधी जोखिम और लंबे समय के परिणामों को clinical trials के जरिए स्थापित करना आवश्यक होगा।
इसलिए वायरल दावे में मौजूद MIT ने ऐसा छोटा wearable pacemaker बना दिया जो बिना किसी invasive procedure के इंसानों के abnormal heart rhythm को ठीक कर सकता है जैसी भाषा को सावधानी से समझना चाहिए। अधिक सटीक निष्कर्ष यह है कि MIT और उसके सहयोगियों ने ultrasound तथा sonogenetics पर आधारित एक experimental non-invasive cardiac pacing system विकसित किया है, जिसने अभी तक मुख्यतः preclinical स्तर पर परिणाम दिखाए हैं।
तथ्य-जांच नोट: ऊपर दिए गए विवरण को MIT News और 2 जून 2026 को प्रकाशित Nature Biomedical Engineering के मूल शोध-पत्र के आधार पर तैयार किया गया है। इसलिए लेख में इलाज, मरीजों में सफल, बाजार में उपलब्ध या पारंपरिक पेसमेकर का सिद्ध विकल्प जैसे दावों से जानबूझकर बचा गया है।



