
अंतिम 48 घंटे
महात्मा गांधी के जीवन के अंतिम अड़तालीस (48) घंटों की झलकियां
बृहस्पतिवार, 29 जनवरी, 1948 गांधीजी के लिये गतिविधियों से भरा व्यस्त दिन था। दिन ढलने तक वे थक कर निढाल हो गए थे। उन्हें चक्कर आ रहे थे। फिर भी मुझे यह पूरा करना ही है उन्होंने कांग्रेस के संविधान के मसौदे की ओर इशारा करते हुए कहा। लगभग सवा नौ बजे वे सोने के लिये उठे। आज बापू बहुत ही अनमने से थे और मनु से उन्होंने एक उर्दू का शेर कहा जिसका अर्थ था: दुनिया के बग़ीचे की बहार बहुत थोड़े दिनों के लिये होती है। थोड़े दिनों के लिये ही इसे देखो। शुक्रवार 30 जनवरी को वे सदा की तरह सुबह 3.30 बजे प्रार्थना के लिये उठ गए। महात्मा गांधी के जीवन का अंतिम दिन भी उनके अन्य दिनों जैसा ही सुव्यवस्थित और व्यस्त रहने वाला था। अपनी लकड़ी की चैकी से उठकर उन्होंने अपने दल के अन्य सदस्यों को जगाया। दल के साथी थे बृजकृष्ण, चांदीवाला, मनु तथा आभा उनकी प्रपौत्रियाँ। उनकी चिकित्सक डाॅ. सुशीला नैयर जो अक्सर उनके साथ होती थीं, पाकिस्तान में थीं। गांधीजी ने एक सामान्य भारतीय के ही समान दातुन से दाँत साफ किये।

प्रार्थना के बाद अपनी प्रिय “लाठियां” मनु और आभा का सहारा लेकर वे धीरे-धीरे अन्दर के कमरे में आ गए जहाँ मनु ने उनके पैरों को कम्बल से ढक दिया। बाहर अभी भी अन्धेरा ही था मगर गांधीजी की दिनचर्या आरम्भ हो चुकी थी। पिछली रात के लिखे कांग्रेस के संविधान के मसौदे को उन्होंने ठीक किया। यही वह दस्तावेज़ था जो उनकी अंतिम वसीयत और वक्तव्य कहलाया। प्रातः 4.45 बजे उन्होंने एक गिलास नींबू, शहद और गुनगुने पानी का सेवन किया और एक घंटे बाद अपना दैनिक सन्तरे का रस पिया। काम करते हुए, उपवास के कारण आई कमज़ोरी की वजह से वे थक गए और थोड़ी देर के लिये सो गए। आधे घंटे बाद ही उठकर गांधीजी ने अपनी पत्राचार की फाइल मांगी। पिछले दिन उन्होंने किशोरलाल मशरूवाला को एक पत्र लिखा था। अपने उपवास के दौरान ही गांधीजी को बहुत खांसी हो गई थी। उसको ठीक करने के लिये वे लौंग के चूर्ण के साथ गुड़ की गोली ले रहे थे। लेकिन सुबह तक लौंग का चूर्ण ख़त्म हो गया था। बापू के साथ कमरे में टहलने की जगह मनु खांसी की गोलियाँ बनाने बैठ गईं। मैं अभी आपके साथ आती हूँ, उन्होंने गांधीजी से कहा, वरना रात के लिये ज़रूरत पड़ने पर कोई दवा नहीं होगी। मगर सदा वर्तमान को महत्व देने वाले गांधीजी ने कहा कौन जाने रात से पहले क्या होने वाला है। मैं ही जीवित रहूँगा या नहीं। यदि रात को मैं जीवित रहा तो तुम उस समय दवाई आसानी से बना लेना।
गांधीजी की पहली भेंट सुबह 7 बजे राजन नेहरू से थी जो अमेरिका जा रही थीं। गांधीजी ने उनसे अपने कमरे में दैनिक कामकाज के बीच ही बातचीत की। अभी उनमें अपने नियमित खुली हवा में सैर करने की शक्ति वापस नहीं आई थी।
प्रातः आठ बजे, वे अपनी मालिष के लिये तैयार हुए। प्यारेलाल के कमरे के सामने से गुज़रते हुए उन्होंने अपने द्वारा पिछली रात को तैयार किया हुआ कांग्रेस का नया संविधान उन्हे संषोधन के लिये दिया। उन्होंने कहा जहाँ ज़रूरत हो खाली स्थानों को भर दो, साथ ही यह भी जोड़ा इसे मैंने बहुत भारी तनाव में लिखा है।
इसके बाद गांधीजी ने अपना स्नान संपन्न किया। स्नान के बाद मनु ने बापू का (जो लगभग पाँच फुट पाँच इंच लम्बे थे) वजन लिया। वे 109 1/2 पाउन्ड के थे। उपवास के बाद से उनका ढाई पाउन्ड वज़न बढ़ गया था। उनकी त़ाकत भी धीरे-धीरे लौट रही थी। प्यारेलाल को भी ऐसा लगा कि स्नान के बाद बापू तरोताज़ा लग रहे थे। पिछली रात का तनाव मानो ख़त्म हो गया था।
सुबह साढ़े नौ बजे उन्होंने अपना सुबह का भोजन लिया, जिसके पहले उन्होंने बंगला लेखन का दैनिक अभ्यास किया। अपनी ऐतिहासिक नोआखली यात्रा के दौरान उन्होंने बंगला भाषा सीखने का प्रयास आरम्भ किया था जिसे उन्होंने जीवन के अन्तिम दिन तक जारी रखा। आज उन्होंने लिखा भैरव का घर नैहाटी में है। शैल उसकी बड़ी पुत्री है। आज शैल का कैलाश के साथ विवाह है।
अभी वे अपना प्रातः का भोजन कर ही रहे थे, जिसमें 12 आउंस बकरी का दूध, कच्ची और पकी सब्जियाँ, सन्तरे, चार टमाटर, गाजर का रस, अदरक, नींबू और एलो का निचोड़ था, जब प्यारेलाल उनके पास कांग्रेस के संविधान का मसौदा लेकर आए। गांधीजी ने ध्यान से हर संषोधन को देखा और पंचायत नेताओं की संख्या में गिनती के दोष को सुधारा।
वर्ष 1920 में जब कांग्रेस की बागडोर गांधीजी को सौंपी गई थी तब उन्होंने सबसे पहले इसके लिये एक संविधान तैयार किया, जिसके साथ कांग्रेस स्वाधीनता संग्राम के निर्णायक दौर में पहुँची। जीवन के अंतिम दिन भी वे कांग्रेस के लिये नया संविधान तैयार करने में लगे हुए थे जिसके आधार पर स्वाधीन भारत का संचालन होना था। आज मानो उनका जीवन चक्र पूर्णता को प्राप्त कर रहा था।
थोड़ी देर विश्राम के बाद उन्होंने मिलने आनेवालांे से भेंट की। दिल्ली से कुछ मौलवी आए हुए थे, जिन्होंने उनके वर्धा जाने के विचार को अपनी सहमति दी। गांधीजी ने उन लोगों से कहा कि वे थोड़े ही समय के लिये अनुपस्थित रहेंगे हाँ, यह और बात है कि ईष्वर की इच्छा कुछ और हो और कोई अनसोची घटना घट जाए।

उन्होंने बिषन से कहा मेरे ज़रूरी पत्र मुझे दे दो। मुझे उनके जवाब आज ही देने चाहिये, क्या पता कल मैं रहूँ न रहूँ।
अपने जीवन के अन्तिम दिन में गांधीजी ने अपने अतिप्रिय स्वर्गीय सचिव श्री महादेव देसाई का भी स्मरण किया। महादेव भाई की जीवनी लिखी जानी थी, परन्तु कुछ आर्थिक पहलुओं पर असहमति हो रही थी। गांधीजी ने इस बारे में अपनी खिन्नता प्रकट की। महादेव की डायरियों का संपादन और संकलन भी होना था। इस कार्य के लिये आदर्ष व्यक्ति, श्री नरहरि पारीख अस्वस्थ थे। गांधीजी ने निर्णय किया कि यह कार्य श्री चन्द्रषेखर षुक्ल को सौंपा जाए। श्री मषरूवाला भी इस कार्य के लिये योग्य दावेदार थे।
महात्मा गांधी श्री सुधीर घोष से भी मिले, जिन्होंने उन्हें बताया कि किस प्रकार ब्रिटिष प्रेस में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू तथा उप-प्रधानमंत्री श्री सरदार वल्लभभाई पटेल के बीच के मतभेदों को उछाला जा रहा था। गांधीजी इस विषय में आज दोपहर को सरदार पटेल से मिलने वाले थे और आज ही षाम सात बजे नेहरू तथा मौलाना आज़ाद से बातचीत करने वाले थे।
गांधीजी से मिलने एक सिन्धी प्रतिनिधिमण्डल आया। उनके कष्टों से उन्हें बहुत पीड़ा पहुँची। गांधीजी ने उन लोगों को बताया कि किस प्रकार एक षरणार्थी ने उन्हें संसार छोड़कर हिमालय में बसने की सलाह दी। हँसते हुए उन्होंने कहा कि यह तो एक दृष्टि से बहुत अच्छा होगा क्योंकि फिर वे दोहरे महात्मा बन जाएंगे और अपनी ओर और भी बड़ी भीड़ को आकर्षित कर सकेंगे। लेकिन वे प्रसिद्धि नहीं चाहते थे, वे एक ऐसी षक्ति और षान्ति चाहते थे जिससे लोगों को चारों ओर फैले अंधकार और दुःख में से बाहर निकाल सकें।
गांधीजी जनवरी की सुहानी धूप में लेट गए और अपने पेट पर मिट्टी का लेप लगाया। अपने चेहरे को उन्होंने नोआखली से लाई हुई बाँस की टोपी से ढक लिया। मनु और आभा उनके पैर दबाने लगीं।
दोपहर 1.30 बजे के लगभग बृजकृष्ण ने गांधीजी को मास्टर तारा सिंह का सन्देष पढ़कर सुनाया जिसमें उन्हें हिमालय जाकर बसने को कहा गया था। पिछले दिन ही एक षरणार्थी ने उनसे ऐसी बात कही थी, जिससे उन्हें चोट पहुँची थी। गांधीजी ने इसके बाद गाजर और नींबू का रस लिया। कुछ दृष्टिहीन और बेघर षरणार्थी उनसे मिलने आए। उन्होंने बृजकृष्ण को उनके बारे में कुछ हिदायते दीं। इसके बाद उन्हें इलाहाबाद मे हुए दंगों की रिपोर्ट पढ़ कर सुनाई गई।
समय बीतता जा रहा था। अब मध्यदोपहरी थी।
दैनिक साक्षात्कारों का सिलसिला लगभग 2.15 बजे फिर आरम्भ हुआ। भारतवर्ष से तथा विदेषों से भी आए अनेक लोग उनसे मिलना चाहते थे। दो पंजाबी उनसे अपने ज़िले में हरिजनों के विषय में बोले। फिर बारी आई दो सिन्धियों की। श्रीलंका के एक प्रतिनिधि अपनी बेटी के साथ उनसे मिलने आए और उनसे श्रीलंका के स्वाधीनता दिवस (14 फरवरी) के लिये संदेष देने का अनुरोध किया। उनकी बेटी ने गांधीजी के हस्ताक्षर लिये, जो उनका अन्तिम हस्ताक्षर सिद्ध हुआ। दोपहर तीन बजे उनसे एक प्रोफेसर मिलने आए और उन्होंने गांधीजी से कहा कि जो वे आज सीख दे रहे हैं वह बुद्ध के समय में दी गई थी। लगभग 3.15 बजे फ्रांस के प्रसिद्ध फोटोग्राफर हेनरी कार्टियर-ब्रेसन ने उन्हें अपने चित्रों की एल्बम भेंट दी। गांधीजी एक पंजाबी तथा एक सिंधी प्रतिनिधिमंडल से मिले जिन्होंने उनसे दिल्ली में 15 फरवरी को आयोजित होने वाले सम्मेलन के लिये अध्यक्ष पद के लिये सुझाव मांगा। गांधीजी ने कांग्रेस अध्यक्ष डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद का नाम सुझाया तथा अपने संदेष देने की बात भी की।
चार बजे तक गांधीजी ने अन्तिम साक्षात्कार समाप्त किया। अब सरदार पटेल के आने का समय भी हो गया था। ठीक चार बजे सरदार पटेल अपनी पुत्री तथा सचिव मणिबेन के साथ आ गए। गांधीजी और सरदार पटेल तत्काल ही विचार-विमर्ष में लीन हो गए।
गांधीजी के उपवास से आई स्थिति में नरमी के बावजूद सरदार पटेल तथा नेहरूजी के बीच आए मतभेदों से गांधीजी अवगत थे तथा इसी कारण से चिन्तित भी थे। वे चाहते थे दोनों के विचारों में मेल रहे।
गांधीजी ने सरदार पटेल से कहा कि यद्यपि उन्होंने पहले सोचा था कि सरदार पटेल अथवा नेहरूजी, दोनों में से किसी एक को मंत्रिमण्डल छोड़ना होगा, परन्तु अब वे भारत के नए गवर्नर जनरल माउन्टबैटेन से सहमत थे कि दोनों ही का होना ज़रूरी था। उन्होंने सरदार पटेल से कहा कि ‘वे षाम की प्रार्थना सभा में यह कहेंगे और नेहरू से भी यही कहेंगे। उन्होंने कहा कि दोनों के बीच किसी मुष्किल स्थिति में वे अपना वर्धा जाना भी स्थगित कर सकते हैं।
सायं 4.30 बजे आभा उनका अन्तिम भोजन लेकर आई: उसमें बकरी का दूध, पकी तथा कच्ची सब्ज़ियाँ, सन्तरे और अदरक, नींबू, मक्खन और एलो का जूस था। अपने कमरे में फर्ष पर बैठकर उन्होंने अपना अन्तिम भोजन लिया तथा सरदार पटेल से बातचीत भी जारी रखी। मणिबेन, सरदार की पुत्री तथा सचिव भी इस बातचीत के दौरान उपस्थित थीं।

अभी गांधीजी और सरदार पटेल की बातचीत चल ही रही थी कि दो काठियावाड़ी नेता आए और मनु से गांधीजी से मिलने की इच्छा प्रकट की। मनु के पूछने पर गांधीजी ने सरदार पटेल के सामने कहा,“उनसे कहो कि मैं उनसे मिलूँगा, लेकिन प्रार्थना सभा के बाद, और वह भी तब यदि मैं जीवित रहा। हम तब बातचीत करेंगे।” मनु ने गांधीजी का उत्तर अतिथियों को दे दिया और उनसे प्रार्थना सभा के लिये रूकने को कहा।Yet again, फिर से गांधीजी ने अपनी मृत्यु की संभावना की बात की थी और इस बार तो उन्होंने यह बात अपनी सुरक्षा के लिये मुख्य रूप से ज़िम्मेदार व्यक्ति के सामने ही कही थी।
उसके बाद गांधीजी ने अपना प्रिय चर्खा मांगा और अन्तिम बार बड़े प्रेमपूर्वक चर्खा काता। मौलाना आजा़द और जवाहरलाल नेहरू उनसे प्रार्थना के बाद मिलने वाले थे।
महात्मा गांधी भारतीय इतिहास के उन प्रमुख नेताओं में शामिल हैं, जिन्होंने सत्य, अहिंसा और जनभागीदारी को राजनीतिक संघर्ष के महत्वपूर्ण साधन के रूप में स्थापित किया। उनका पूरा नाम मोहनदास करमचंद गांधी था। उनका जन्म 2 अक्टूबर 1869 को गुजरात के पोरबंदर में हुआ था। उनके पिता करमचंद गांधी और माता पुतलीबाई थीं। गांधीजी का जीवन केवल भारत के स्वतंत्रता आंदोलन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उनके विचारों ने दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में नागरिक अधिकारों और अहिंसक आंदोलनों को भी प्रभावित किया।
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

गांधीजी का बचपन गुजरात में बीता। उनके परिवार का संबंध प्रशासनिक सेवा से था। उन्होंने राजकोट में अपनी प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की। वर्ष 1887 में मैट्रिक की परीक्षा पास करने के बाद उन्होंने भावनगर के सामलदास कॉलेज में प्रवेश लिया, लेकिन पढ़ाई जारी नहीं रख सके। इसके बाद कानून की शिक्षा प्राप्त करने के लिए वे इंग्लैंड गए।
1888 में वे इंग्लैंड पहुंचे और Inner Temple में कानून की पढ़ाई शुरू की। 1891 में उन्हें बार में बुलाया गया और वे भारत लौट आए। कुछ समय वकालत करने के बाद 1893 में वे दक्षिण अफ्रीका गए, जहां भारतीय समुदाय से जुड़े एक कानूनी मामले में काम करना था।
दक्षिण अफ्रीका में विचारों का विकास
दक्षिण अफ्रीका गांधीजी के राजनीतिक और सामाजिक विचारों के विकास का महत्वपूर्ण चरण था। वहां उन्हें नस्लीय भेदभाव का सामना करना पड़ा। 31 मई 1893 को पीटरमैरिट्जबर्ग स्टेशन पर उन्हें प्रथम श्रेणी के डिब्बे से बाहर निकाल दिया गया। इस घटना सहित दक्षिण अफ्रीका में उनके अनुभवों ने अन्याय के विरुद्ध संघर्ष के उनके दृष्टिकोण को प्रभावित किया।
दक्षिण अफ्रीका में उन्होंने भारतीय समुदाय को संगठित किया और भेदभावपूर्ण कानूनों के खिलाफ अहिंसक प्रतिरोध का प्रयोग किया। 1906 में जोहान्सबर्ग में सत्याग्रह के शुरुआती संगठित प्रयोगों में से एक सामने आया। इसी दौर में गांधीजी के राजनीतिक संघर्ष का आधार मजबूत हुआ।
भारत वापसी और स्वतंत्रता आंदोलन
गांधीजी 1915 में भारत लौटे। भारत आने के बाद उन्होंने देश के विभिन्न हिस्सों का दौरा किया और आम लोगों, किसानों तथा श्रमिकों की समस्याओं को समझने का प्रयास किया। धीरे-धीरे वे भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के प्रमुख नेताओं में शामिल हो गए।
भारत में गांधीजी के शुरुआती महत्वपूर्ण आंदोलनों में 1917 का चंपारण सत्याग्रह विशेष रूप से उल्लेखनीय है। बिहार के चंपारण में किसानों को नील की खेती से जुड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा था। गांधीजी ने किसानों की शिकायतों को समझने और उनके पक्ष को सामने लाने के लिए आंदोलन का नेतृत्व किया। भारत सरकार के आजादी का अमृत महोत्सव पोर्टल के अनुसार, चंपारण आंदोलन गांधीजी की भारत में पहली बड़ी उपलब्धियों में से एक था।
इसके बाद 1918 में खेड़ा सत्याग्रह हुआ। गुजरात के खेड़ा क्षेत्र में फसल की खराब स्थिति और आर्थिक कठिनाइयों के बीच किसानों ने राजस्व में राहत की मांग की। गांधीजी ने किसानों के आंदोलन का समर्थन किया और सत्याग्रह तथा असहयोग को संघर्ष के साधन के रूप में इस्तेमाल किया।
असहयोग आंदोलन और स्वदेशी
गांधीजी ने स्वतंत्रता आंदोलन को आम जनता से जोड़ने पर विशेष जोर दिया। उन्होंने स्वदेशी और भारतीय वस्तुओं के उपयोग को प्रोत्साहित किया तथा ब्रिटिश वस्तुओं के बहिष्कार का समर्थन किया। उनका मानना था कि राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ आर्थिक और सामाजिक आत्मनिर्भरता भी महत्वपूर्ण है।
1920 के दशक में असहयोग आंदोलन के माध्यम से स्वतंत्रता आंदोलन व्यापक जनभागीदारी वाला आंदोलन बना। हालांकि गांधीजी का तरीका अहिंसक था और वे आंदोलन में हिंसा को स्वीकार नहीं करते थे। उनका राजनीतिक दर्शन सत्य और अहिंसा पर आधारित था।

नमक सत्याग्रह और दांडी मार्च
गांधीजी के सबसे प्रसिद्ध आंदोलनों में 1930 का नमक सत्याग्रह शामिल है। ब्रिटिश शासन के नमक संबंधी कानूनों के विरोध में गांधीजी ने साबरमती आश्रम से दांडी तक मार्च किया। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के अनुसार, गांधीजी और उनके साथियों ने लगभग 240 मील की यात्रा कर दांडी पहुंचकर समुद्री जल से नमक बनाने के माध्यम से ब्रिटिश नमक कानून को चुनौती दी।
दांडी मार्च ने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी व्यापक ध्यान दिलाया। यह नागरिक अवज्ञा के उन उदाहरणों में शामिल हुआ, जिनमें कानून का अहिंसक तरीके से विरोध किया गया।
भारत छोड़ो आंदोलन
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान स्वतंत्रता की मांग और तेज हुई। वर्ष 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हुआ। गांधीजी ने ब्रिटिश शासन से भारत छोड़ने का आह्वान किया। आंदोलन के बाद गांधीजी सहित कांग्रेस के अनेक नेताओं को गिरफ्तार किया गया।
गांधीजी के लिए स्वतंत्रता केवल सत्ता परिवर्तन का प्रश्न नहीं था। वे सामाजिक सुधार, आत्मनिर्भरता, स्वच्छता, ग्रामीण विकास, अस्पृश्यता के विरोध और सामुदायिक सद्भाव जैसे मुद्दों को भी महत्वपूर्ण मानते थे। गांधी हेरिटेज पोर्टल पर उनके जीवन, लेखन, सत्याग्रह, यात्राओं, उपवास और आंदोलनों से संबंधित विस्तृत प्राथमिक सामग्री उपलब्ध है।
विभाजन और साम्प्रदायिक सद्भाव के प्रयास
1947 में भारत स्वतंत्र हुआ, लेकिन देश का विभाजन भी हुआ और कई क्षेत्रों में साम्प्रदायिक हिंसा हुई। गांधीजी विभाजन के निर्णय से सहमत नहीं थे। स्वतंत्रता के आसपास उन्होंने हिंसा प्रभावित क्षेत्रों का दौरा किया और हिंदू-मुस्लिम एकता तथा शांति के लिए प्रयास किए। सरकारी गांधी स्मृति के कालक्रम के अनुसार, उन्होंने 1947 में बिहार सहित विभिन्न क्षेत्रों का दौरा किया और साम्प्रदायिक तनाव कम करने के प्रयास किए।
गांधीजी का अंतिम दौर भी शांति और साम्प्रदायिक सद्भाव के प्रयासों से जुड़ा रहा। जनवरी 1948 में उन्होंने दिल्ली में साम्प्रदायिक एकता के लिए उपवास किया।
गांधीजी की हत्या
30 जनवरी 1948 को नई दिल्ली स्थित बिड़ला हाउस में प्रार्थना सभा के लिए जाते समय गांधीजी की हत्या कर दी गई। सरकारी अभिलेखों के अनुसार उनकी हत्या नाथूराम विनायक गोडसे ने की थी। गांधीजी उस समय 78 वर्ष के थे।
उनकी मृत्यु भारत के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण और दुखद घटनाओं में से एक रही। इसके बाद गांधीजी के विचारों और लेखन को संरक्षित करने के लिए विभिन्न संस्थागत प्रयास किए गए।
“राष्ट्रपिता” और “महात्मा” संबोधन की वास्तविकता
गांधीजी को आम तौर पर भारत में “राष्ट्रपिता” कहा जाता है। हालांकि तथ्यात्मक रूप से यह स्पष्ट करना जरूरी है कि भारत सरकार ने उन्हें “राष्ट्रपिता” की उपाधि प्रदान करने संबंधी कोई आधिकारिक अधिसूचना जारी नहीं की है। गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति की आधिकारिक FAQ के अनुसार, उपलब्ध जानकारी में नेताजी सुभाष चंद्र बोस द्वारा 4 जून 1944 को आजाद हिंद रेडियो, रंगून से गांधीजी को “Father of the Nation” कहकर संबोधित करने का उल्लेख मिलता है।
इसी प्रकार गांधीजी को “महात्मा” कहने वाले व्यक्ति के संबंध में भी भारत सरकार के पास कोई निर्णायक आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं है। सरकारी जानकारी के अनुसार, उपलब्ध स्रोतों में रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा 1915 में गांधीजी को “महात्मा” कहे जाने का उल्लेख मिलता है।
इसलिए किसी तथ्यात्मक लेख में यह लिखना अधिक सही है कि गांधीजी लोकप्रिय रूप से “राष्ट्रपिता” के नाम से जाने जाते हैं, न कि यह कि भारत सरकार ने उन्हें औपचारिक रूप से यह संवैधानिक या सरकारी उपाधि प्रदान की थी।
गांधीजी की विरासत

गांधीजी की विरासत उनके राजनीतिक आंदोलनों के साथ-साथ उनके लेखन और सामाजिक विचारों में भी दिखाई देती है। उनके प्रमुख लेखन में “हिंद स्वराज”, “सत्याग्रह इन साउथ अफ्रीका” और “द स्टोरी ऑफ माई एक्सपेरिमेंट्स विद ट्रुथ” शामिल हैं। गांधी हेरिटेज पोर्टल पर उनके लेखन और Collected Works of Mahatma Gandhi का विस्तृत संग्रह उपलब्ध है। भारत सरकार के अनुसार, गांधीजी के उपलब्ध लेखन का व्यवस्थित दस्तावेजीकरण किया गया और Collected Works के 100वें खंड का प्रकाशन 2 अक्टूबर 1994 को पूरा हुआ।
भारत में 2 अक्टूबर को गांधी जयंती के रूप में मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र ने भी 2 अक्टूबर को International Day of Non-Violence के रूप में मनाने का निर्णय लिया है। गांधीजी की सत्य और अहिंसा की अवधारणाओं ने भारत के बाहर भी नागरिक अधिकार आंदोलनों को प्रभावित किया।
महात्मा गांधी का जीवन भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन, सामाजिक सुधार और अहिंसक राजनीतिक संघर्ष के इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा है। उन्होंने सत्याग्रह और अहिंसा को राजनीतिक संघर्ष के प्रभावी साधनों के रूप में विकसित किया और स्वतंत्रता आंदोलन को व्यापक जनभागीदारी से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके जीवन का मूल्यांकन करते समय श्रद्धा के साथ-साथ ऐतिहासिक तथ्यों, प्राथमिक स्रोतों और आधिकारिक अभिलेखों को ध्यान में रखना भी जरूरी है।
गांधीजी का जीवन यह दिखाता है कि स्वतंत्रता का प्रश्न केवल राजनीतिक सत्ता से जुड़ा नहीं था, बल्कि सामाजिक न्याय, आत्मनिर्भरता, मानव गरिमा और साम्प्रदायिक सद्भाव जैसे विषय भी उससे जुड़े थे। इसी कारण उनका जीवन और विचार आज भी इतिहास, राजनीति, सामाजिक आंदोलनों और अहिंसा के अध्ययन का महत्वपूर्ण विषय बने हुए हैं।



