
क्रिकेट की दुनिया में आए दिन बहसें होती रहती हैं, लेकिन एक बहस जो हाल के दिनों में काफी गरमाई है, वह है टी20 क्रिकेट की असली पहचान को लेकर। हाल ही में पूर्व ऑस्ट्रेलियाई कप्तान मार्क टेलर ने एक ऐसा बयान दिया है, जिसने सभी क्रिकेट प्रेमियों के बीच हलचल मचा दी है।
टेलर का कहना है कि “टी20 को क्रिकेट नहीं कहना चाहिए।” उनके अनुसार, यह खेल क्रिकेट के मूल सिद्धांतों से इतना दूर हो गया है कि इसे कुछ और ही नाम दिया जाना चाहिए। आइए, इस ब्लॉग में इस बयान की गहराई में जाते हैं और समझते हैं कि आखिर मार्क टेलर ऐसा क्यों कहते हैं।
⚫ टी20 ने कैसे बदल दी ‘बल्लेबाजी’ की परिभाषा
मार्क टेलर के अनुसार, टी20 ने बल्लेबाजी की परिभाषा को ही पूरी तरह बदल दिया है। पारंपरिक क्रिकेट (टेस्ट या प्रथम श्रेणी) में बल्लेबाजी का मतलब था:
👉 गेंद को सम्मान देना।
👉 रक्षात्मक खेल दिखाना।
👉 गलत गेंद पर ही रन बनाना।
👉 विकेट बचाकर लंबी पारी खेलना।
👉 जिम्मेदारी और धैर्य का प्रदर्शन करना।
लेकिन टी20 में यह सब पलट गया है। यहाँ हर गेंद पर बाउंड्री मारना ही मकसद बन गया है। बल्लेबाज अब जिम्मेदारी से नहीं, बल्कि बेफिक्र होकर हवाई शॉट खेलते हैं। मार्क टेलर कहते हैं कि यह क्रिकेट के खिलाफ है।
⚫ जिम्मेदारी का अंतः क्या टी20 में कोई सबक नहीं है
टेलर का सबसे बड़ा तर्क है कि टी20 में “जिम्मेदारी” नाम की कोई चीज़ नहीं बची है। पहले के जमाने में अगर एक सलामी बल्लेबाज 30 गेंदों में 15 रन बनाता था, तो उसे जिम्मेदार समझा जाता था क्योंकि वह विकेट बचाकर टीम की नींव रख रहा था। लेकिन आज टी20 में उसी बल्लेबाज को ‘डॉट बॉल्स’ खेलने पर आलोचना का सामना करना पड़ता है।
टी20 में सिर्फ एक चीज मायने रखती है – स्ट्राइक रेट। चाहे आप 15 रन पर आउट हो जाएं, लेकिन अगर आपने 135 की स्ट्राइक रेट से खेला, तो आपको अच्छा माना जाएगा। यही वह बिंदु है जहां टेलर असहमत हैं। वह चाहते हैं कि खिलाड़ी परिस्थितियों के अनुसार खेलें, न कि सिर्फ एक ही टेम्पो पर।
⚫ क्या टी20 सिर्फ एक ‘मनोरंजन शो’ है
मार्क टेलर के इस तर्क से कई दिग्गज खिलाड़ी सहमत भी हैं। पूर्व भारतीय कप्तान सुनील गावस्कर तो पहले ही कह चुके हैं कि टी20 असली क्रिकेट नहीं है, यह सर्कस है। इंग्लैंड के पूर्व कप्तान ज्योफ्री बायकॉट ने भी टी20 को “बेसबॉल” जैसा करार दिया था।
टी20 का उद्देश्य ही दर्शकों को मनोरंजन देना है। छक्के-चौके, नए-नए शॉट्स (रैंप शॉट, स्कूप, हेलिकॉप्टर शॉट), और हर ओवर में रनों की बौछार। इसमें गेंदबाजों को दया नहीं दिखाई जाती। इसलिए टेलर जैसे पुराने जमाने के शुद्ध तकनीकी खिलाड़ियों के लिए यह फॉर्मेट बिल्कुल अजीब है।
⚫ क्या यह बयान सही है? (दूसरा पक्ष)
हालांकि, यहाँ एक दूसरा पक्ष भी है। टी20 ने क्रिकेट को वैश्विक बनाया है। जिन देशों में क्रिकेट लोकप्रिय नहीं था (जैसे अफगानिस्तान, यूएई), वहाँ टी20 ने क्रिकेट पहुंचाया। इसने कई युवा खिलाड़ियों को सितारा बनाया और क्रिकेट को एक संपन्न इंडस्ट्री (आईपीएल, बिग बैश) बना दिया।
साथ ही, यह तर्क भी गलत नहीं है कि टी20 में भी अपनी ‘जिम्मेदारी’ होती है। एक कप्तान के रूप में आपको पता होता है कि कब किस गेंदबाज को डालना है, पावरप्ले में कैसे आक्रामक होना है, और डेथ ओवरों में कैसे यॉर्कर फेंकना है।
हर फॉर्मेट की अपनी अलग बारीकियां (नुएंस) होती हैं।
⚫ T20 को क्रिकेट नहीं कहना चाहिए: मार्क टेलर
पूर्व ऑस्ट्रेलियाई कप्तान मार्क टेलर ने कहा है कि टी20 क्रिकेट नहीं है और इसे कुछ और कहना चाहिए। उन्होंने कहा कि सबसे छोटे फॉर्मेंट में बल्लेबाज़ी क्रिकेट के सिद्धांतों के उलट है और टी20 ने बल्लेबाज़ी की परिभाषा बदल दी है। टेलर के मुताबिक, टी20 में ज़िम्मेदारी नहीं रही, क्योंकि ध्यान सिर्फ तेज़ी से रन बनाने पर होता है।
⚫ क्या टी20 कोई और नाम पाने का हकदार है
मार्क टेलर का बयान जितना कठोर है, उतना ही विचारणीय भी है। अगर आप शुद्ध तकनीकी और धैर्य वाले क्रिकेट के दीवाने हैं, तो आप टेलर से सहमत होंगे कि टी20 ने उस पवित्रता को खत्म कर दिया है।
लेकिन अगर आप क्रिकेट के प्रशंसक हैं, तो आप मानेंगे कि हर फॉर्मेट का अपना महत्व है। टेस्ट क्रिकेट योग है, वनडे दौड़ है, और टी20 बॉक्सिंग है। तीनों अलग-अलग हैं, लेकिन तीनों ही अपनी जगह कठिन हैं।
हो सकता है कि हमें टी20 को ‘क्रिकेट’ न कहकर ‘ट्वेंटी-ट्वेंटी बैश’ या ‘पॉवर क्रिकेट’ कह देना चाहिए, जैसा कि मार्क टेलर सुझाव दे रहे हैं। लेकिन इतना तय है जब तक स्टेडियम भरे रहेंगे और दर्शक छक्कों के लिए चिल्लाते रहेंगे, तब तक टी20 यहीं रहेगा – चाहे उसे क्रिकेट कहें या कुछ और।
आपकी क्या राय है? क्या टी20 को क्रिकेट कहना उचित है या इसे कोई नया नाम मिलना चाहिए? कमेंट में जरूर बताएं