
पैरेंटिंग कोच शिखा शर्मा ने माता-पिता की उन 5 आदतों के बारे में बताया है जिसके चलते बच्चे का पढ़ाई में मन नहीं लगता है और वे कमज़ोर रह जाते हैं। इनमें ‘सिर्फ मार्क्स पर ध्यान देना, दूसरों से तुलना करना, घर का खराब रूटीन, फोन में व्यस्त रहना और होमवर्क व प्रॉब्लम का खुद हल कर देना’ शामिल हैं।
हर माता-पिता चाहता है कि उसका बच्चा पढ़ाई में तेज हो, हर विषय में अव्वल आए और जीवन में सफलता की ऊंचाइयों को छुए। लेकिन कई बार बच्चे का मन पढ़ाई में नहीं लगता, वह कमज़ोर रह जाता है, और उसके अंक गिरने लगते हैं। ऐसे में ज्यादातर माता-पिता बच्चे को ही दोष देते हैं, जबकि असल में कहीं न कहीं उनकी अपनी कुछ आदतें इसकी वजह बनती हैं।
प्रसिद्ध पैरेंटिंग कोच शिखा शर्मा के अनुसार, माता-पिता की 5 ऐसी आदतें हैं, जो बच्चे का पढ़ाई में मन न लगने और कमज़ोर होने का कारण बन जाती हैं। आइए, इन विस्तार से समझते हैं और जानते हैं कि इनसे कैसे बचा जाए।
1. सिर्फ मार्क्स पर ध्यान देना (Only Focus on Marks)
जब माता-पिता बच्चे से हर परीक्षा के बाद सिर्फ ‘कितने नंबर आए?’ पूछते हैं, तो बच्चा यह सीखता है कि उसकी कीमत सिर्फ उसके अंकों से है। यह दबाव उसे रट्टा मारने पर मजबूर कर देता है, न कि विषय को समझने और उसमें रुचि लेने का।
⚫ क्या होता है असर?
बच्चा सीखने की बजाय अंक पाने की जुगत में लग जाता है। नंबर कम आने पर वह आत्मविश्वास खो बैठता है, और पढ़ाई उसके लिए एक बोझ बन जाती है।
सुझाव: बच्चे से उसके द्वारा सीखी गई नई चीज़ों, उसकी समझ और कोशिशों के बारे में बात करें। ‘तुमने क्या नया सीखा?’ यह सवाल ‘कितने नंबर आए?’ से कहीं ज्यादा असरदार है।
2. दूसरों से तुलना करना (Comparing with Others)
“तुम्हारी क्लास के राहुल को देखो, वह हमेशा फर्स्ट आता है।” ऐसी बातें बच्चे के मन में एक डर और हीन भावना पैदा करती हैं। हर बच्चा अलग होता है – उसकी अपनी योग्यता, रुचि और सीखने की गति होती है।
⚫ क्या होता है असर?
लगातार तुलना होने पर बच्चा या तो विद्रोही हो जाता है और पढ़ाई से मुंह मोड़ लेता है, या फिर आत्मसम्मान खोकर चुपचाप सहम जाता है। दोनों ही स्थितियों में उसकी पढ़ाई प्रभावित होती है।
सुझावः दूसरों से तुलना करने की बजाय बच्चे की आज की तुलना उसके कल से करें। उसकी छोटी-छोटी उपलब्धियों की तारीफ करें। उसे बताएं कि वह खुद में अनमोल है।
3. घर का खराब रूटीन (Poor Household Routine)
बिना अनुशासन और नियमितता वाला घर, बच्चे के लिए सबसे बड़ा विघ्न होता है। जब घर में खाने, सोने और पढ़ने का कोई निश्चित समय नहीं होता, टीवी या मोबाइल हर समय चलता रहता है, तो बच्चा भी अस्थिर हो जाता है।
⚫ क्या होता है असर?
बच्चा समय प्रबंधन नहीं सीख पाता। देर रात तक जागना, समय पर होमवर्क न करना, और पढ़ते समय बार-बार ध्यान भटकना – ये सब खराब रूटीन के नतीजे हैं।
सुझाव: घर का एक निश्चित दिनचर्या बनाएं। पढ़ाई का समय, खेलने का समय, और खाने-सोने का समय नियत करें। एक अनुशासित वातावरण बच्चे को मानसिक शांति और फोकस देता है।
4. फोन में व्यस्त रहना (Constant Phone Engagement)
बच्चे अपने माता-पिता को जैसा करते हुए देखते हैं, वैसा ही सीखते हैं। अगर माता-पिता खुद हर समय फोन, लैपटॉप या टीवी में व्यस्त रहेंगे, तो बच्चा भी यही समझेगा कि यह सामान्य है। जब आप उसे पढ़ने के लिए कहेंगे, तो वह आपसे सवाल करेगा – “आप खुद फोन देखते हो, तो मैं क्यों नहीं देख सकता?”
⚫ क्या होता है असर?
बच्चा आपके ‘डू एज़ आई से, नॉट एज़ आई डू’ रवैये को पहचान लेता है। इससे आपकी बातों का असर कम हो जाता है, और वह खुद भी डिजिटल दुनिया में खो जाता है।
सुझाव: बच्चे के पढ़ने के समय आप भी कोई किताब पढ़ें या अपने कोई रचनात्मक काम करें। बच्चे को स्क्रीन-फ्री ज़ोन दें और खुद भी उसका पालन करें।
5. होमवर्क और प्रॉब्लम का खुद हल कर देना (Solving Everything for Them)
कई माता-पिता बच्चे पर ‘दया’ करते हुए या समय बचाने के लिए उसका होमवर्क खुद कर देते हैं या हर समस्या का हल तुरंत बता देते हैं। जैसे ही बच्चा किसी सवाल में फंसता है, माँ-बाप आगे आ जाते हैं।
⚫ क्या होता है असर?
बच्चा संघर्ष (struggle) करना नहीं सीखता। वह मुश्किल आने पर हार मान लेता है क्योंकि उसे पता है कि कोई तो हल कर देगा। इससे उसकी समस्या-समाधान की क्षमता और आत्मनिर्भरता खत्म हो जाती है।
सुझाव: उसकी मदद करें, लेकिन सीधे उत्तर न दें। उसे सोचने के लिए प्रोत्साहित करें। कहें, “ये प्रॉब्लम थोड़ी मुश्किल है, आइए साथ मिलकर सोचते हैं। पहले तुम अपनी तरफ से कोशिश करो।” गलतियाँ करने दें, क्योंकि गलतियों से ही सीख मिलती है।
निष्कर्ष
बच्चे का पढ़ाई में मन न लगना और कमज़ोर रहना हमेशा उसकी अक्षमता नहीं होती, बल्कि कई बार यह हमारी पैरेंटिंग स्टाइल का आईना होता है। अगर हम चाहते हैं कि हमारा बच्चा पढ़ाई में रुचि ले और आत्मविश्वास से भरा हो, तो हमें सबसे पहले अपनी इन 5 आदतों पर काम करना होगा।
बच्चों को रट्ट बनाने की बजाय जिज्ञासु बनाइए। उन्हें डांटने और तुलना करने की बजाय प्यार और समझ से सीखने का माहौल दीजिए। याद रखिए – पैरेंटिंग में सुधार से ही एक बेहतर इंसान और सीखने वाला बच्चा तैयार होता है।
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