
दुनिया की सबसे चर्चित और जटिल राजनयिक दुविधाओं में से एक है ईरान और अमेरिका के बीच लटकता परमाणु मुद्दा। हाल ही में हुई बातचीत भी बेनतीजा रही, और दोनों पक्षों के बयानों ने साफ कर दिया कि रास्ते में कितनी बड़ी रुकावटें हैं। आइए समझते हैं कि आखिर क्यों यह समझौता हर बार नाकाम हो जाता है।
1. भरोसे की मूल समस्या – क्या ईरान चाहता है परमाणु बम ?
अमेरिकी उप-राष्ट्रपति जेडी वेंस ने अपने बयान में कहा, “हमें सकारात्मक आश्वासन चाहिए था कि वे परमाणु हथियार नहीं बनाएंगे, लेकिन ऐसा कुछ दिखा नहीं।”
यह एक बुनियादी सवाल है – अमेरिका और पश्चिमी देशों को लगता है कि ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाएं सिर्फ शांतिपूर्ण ऊर्जा तक सीमित नहीं हैं। वे चाहते हैं कि ईरान न सिर्फ संधि करे, बल्कि हर समय जांच के दायरे में रहे। ईरान का कहना है कि वह परमाणु हथियार नहीं बनाना चाहता, लेकिन उसकी सैन्य प्रौद्योगिकियों और छुपे हुए संयंत्रों के कारण अमेरिका को संदेह बना रहता है। जब तक ईरान पूरी पारदर्शिता नहीं दिखाता, अमेरिका समझौते को जोखिम भरा मानता है।
2. ईरान के लिए ‘लेबनान और क्षेत्रीय सुरक्षा’ क्यों है अहम ?
ईरानी सरकार समर्थक प्रभावशाली व्यक्ति अली घोलहाकी ने साफ कहा, “लेबनान पर अमेरिका की तरफ से कोई कमिटमेंट नहीं मिला…”
यानी ईरान के लिए परमाणु मसला अकेला नहीं है। वह चाहता है कि अमेरिका लेबनान (हिजबुल्लाह), सीरिया, इराक और यमन में उसकी भूमिका को स्वीकार करे। ईरान मध्य-पूर्व में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है और चाहता है कि अमेरिकी प्रतिबंध हटाने के साथ-साथ इन क्षेत्रों में भी उसकी सुरक्षा चिंताओं को समझा जाए। अमेरिका के लिए यह शर्त मान लेना मुश्किल है, क्योंकि वह ईरान को ‘क्षेत्रीय अस्थिरता फैलाने वाला’ मानता है।
3. होर्मुज़ जलडमरूमध्य में टेस्ट – ताकत का खेल
घोलहाकी के बयान का दूसरा हिस्सा बेहद अहम है – “आज होर्मुज़ स्ट्रेट पर एक टेस्ट हुआ, जिसे ईरान ने ठुकरा दिया।”
होर्मुज़ जलडमरूमध्य दुनिया के 20% तेल व्यापार का रास्ता है। जब बातचीत ठप होती है, तो ईरान सैन्य ताकत दिखाकर यह संदेश देता है कि “हम दबाव में नहीं झुकेंगे”। वहीं अमेरिका अपने बेड़े और सहयोगियों के साथ यह दिखाता है कि वह इस रास्ते को खुला रखेगा। यह ‘टेस्ट’ असल में एक प्रदर्शन होता है – ईरान मिसाइल या ड्रोन टेस्ट करता है, और अमेरिका उसे अस्वीकार करते हुए कहता है कि यह अंतरराष्ट्रीय नियमों के खिलाफ है। इस तरह की घटनाएं भरोसे को और तोड़ती हैं।
समझौता क्यों मुश्किल है? – चार बड़ी अड़चनें
1. पारस्परिक अविश्वासः अमेरिका ने 2018 में ट्रंप प्रशासन
के तहत पुराने परमाणु समझौते (JCPOA) से बाहर निकलकर एक बार फिर भरोसा तोड़ दिया था। ईरान अब अमेरिकी वादों पर भरोसा नहीं करता। वहीं अमेरिका को ईरान की मौजूदा गतिविधियों पर शक है।
2. क्षेत्रीय तनावः ईरान चाहता है कि अमेरिका उसके क्षेत्रीय प्रभाव को स्वीकार करे, जबकि अमेरिका ईरान के प्रॉक्सी समूहों (हिजबुल्लाह, हौथी, हशद अल-शाबी) को सीधा खतरा मानता है।
3. प्रतिबंध बनाम शर्तें: ईरान चाहता है कि सभी आर्थिक
प्रतिबंध तुरंत और पूरी तरह हटें। अमेरिका कहता है पहले परमाणु कार्यक्रम पर पूरा नियंत्रण करो, फिर प्रतिबंधों में राहत की बात होगी। यह ‘पहले अंडा, पहले मुर्गी’ वाली स्थिति है।
4. आंतरिक राजनीतिः अमेरिका में रिपब्लिकन और
डेमोक्रेट्स की ईरान नीति अलग है। ईरान में भी रूढ़िवादी और उदारवादी गुटों के बीच फूट है। किसी भी समझौते पर अमेरिका में अगला राष्ट्रपति उसे पलट सकता है, और ईरान में सुप्रीम लीडर उसे अस्वीकार कर सकते हैं।
निष्कर्षः क्या भविष्य में कोई उम्मीद है?
अभी तो स्थिति गतिरोध वाली है। अमेरिका चाहता है ‘लंबा और मजबूत समझौता’ जो ईरान की परमाणु क्षमता को सीमित करे और उसके मिसाइल कार्यक्रम को भी संबोधित करे। ईरान चाहता है कि अमेरिका बिना शर्त प्रतिबंध हटाए और क्षेत्र में उसकी ताकत को स्वीकार करे।
जब तक होर्मुज़ जलडमरूमध्य में ‘टेस्ट’ और लेबनान जैसे मुद्दों पर कोई समझ नहीं बनती, तब तक यह समझौता उतना ही दूर लगता है। यह केवल परमाणु सवाल नहीं है – यह पूरे मध्य-पूर्व के भविष्य, तेल की कीमतों, इजराइल की सुरक्षा और ईरान के अस्तित्व का सवाल है। दोनों पक्ष अभी एक-दूसरे के सामने झुकने को तैयार नहीं हैं, और इसी टकराव में समझौता बार-बार टूट रहा है।
नोट: क्या आपको लगता है कि बिडेन या भविष्य का कोई राष्ट्रपति इस पहेली को सुलझा पाएगा? कमेंट में बताएं।