Sunday, 13 September 202620:06 IST

हूती विद्रोही कौन हैं और लाल सागर तक कैसे बढ़ा उनका प्रभाव? यमन के संघर्ष की पूरी कहानी

Updated: 13 Sep 2026, 05:54 IST · By Yk Pasha · 1 min read
Advertisement
Screenshot 20260912 0758212079202056621117712 1024x593

यमन में सक्रिय हूती आंदोलन (Houthi movement) पिछले एक दशक से मध्य-पूर्व की राजनीति और सुरक्षा का एक महत्वपूर्ण केंद्र बना हुआ है। सितंबर 2026 में लाल सागर के पश्चिमी तट और बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य के आसपास हूती बलों की नई सैन्य बढ़त ने इस संघर्ष को फिर से अंतरराष्ट्रीय चर्चा में ला दिया है। हाल की रिपोर्टों के अनुसार हूती बलों ने यमन के पश्चिमी तट पर महत्वपूर्ण इलाकों, मोखा बंदरगाह और पेरिम/मयून द्वीप जैसे रणनीतिक स्थानों पर अपनी पकड़ मजबूत की है।

लेकिन सोशल मीडिया या वायरल पोस्ट में इसे केवल “हूतियों ने सऊदी अरब को हराकर लाल सागर पर कब्जा कर लिया” कहना अत्यधिक सरलीकरण होगा। वास्तव में संघर्ष यमन की जमीन पर हो रहा है और इसके पीछे यमन का गृहयुद्ध, क्षेत्रीय शक्ति-संघर्ष, ईरान-सऊदी प्रतिद्वंद्विता तथा लाल सागर के महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग की रणनीतिक अहमियत—सभी जुड़े हुए हैं।

हूती कौन हैं?
हूतियों का आधिकारिक नाम अंसार अल्लाह (Ansar Allah) है। यह यमन का एक सशस्त्र राजनीतिक-धार्मिक आंदोलन है, जिसकी जड़ें उत्तरी यमन के ज़ैदी समुदाय में हैं। आंदोलन का नाम हूती परिवार से जुड़ा है और अब्दुल-मलिक अल-हूती इसके प्रमुख नेता हैं। संयुक्त राष्ट्र के रिकॉर्ड के अनुसार उन्होंने 2004 में अपने भाई हुसैन बद्रेद्दीन अल-हूती की मृत्यु के बाद आंदोलन का नेतृत्व संभाला।

हूती आंदोलन की शुरुआत केवल एक सैन्य संगठन के रूप में नहीं हुई थी। समय के साथ यह राजनीतिक आंदोलन से एक शक्तिशाली सशस्त्र संगठन में बदल गया। अमेरिका और कई अन्य देशों के लिए यह एक गंभीर सुरक्षा चुनौती है, जबकि ईरान इसे अपने क्षेत्रीय सहयोगियों में से एक के रूप में समर्थन देता रहा है। ईरानी समर्थन में हथियार, प्रशिक्षण और तकनीकी/सैन्य सहायता शामिल होने की रिपोर्टें हैं। हालांकि तेहरान हूतियों को सीधे नियंत्रित करने के आरोपों से इनकार करता है।

यमन में संघर्ष की शुरुआत कैसे हुई?
हूतियों की वर्तमान ताकत को समझने के लिए 2014 की घटनाओं को समझना जरूरी है।

2014 में यमन राजनीतिक और आर्थिक संकट से गुजर रहा था। हूती लड़ाकों और उनके सहयोगियों ने राजधानी सना (Sana’a) पर कब्जा कर लिया और देश के दूसरे हिस्सों में भी तेजी से प्रभाव बढ़ाया। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार सितंबर 2014 में हूती और उनसे जुड़े सैन्य बलों ने सना पर नियंत्रण स्थापित किया।

इसके बाद जनवरी 2015 में हूतियों ने राष्ट्रपति अब्द रब्बुह मंसूर हादी की सरकार पर और दबाव बढ़ाया। राष्ट्रपति हादी बाद में सना से निकलकर अदन पहुंचे और फिर सऊदी अरब चले गए।

मार्च 2015 में हादी सरकार के अनुरोध पर सऊदी अरब के नेतृत्व में एक सैन्य गठबंधन ने यमन में हस्तक्षेप किया। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार यह सैन्य अभियान 26 मार्च 2015 को शुरू हुआ था। इसका घोषित उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त यमनी सरकार को समर्थन देना था।

इस तरह यमन का संघर्ष केवल घरेलू गृहयुद्ध नहीं रहा, बल्कि इसमें क्षेत्रीय शक्तियां भी सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से शामिल हो गईं।

सऊदी अरब और हूतियों के बीच टकराव क्यों हुआ?
सऊदी अरब की दक्षिणी सीमा यमन से लगती है। इसलिए यमन में किसी शक्तिशाली विरोधी सशस्त्र संगठन का नियंत्रण रियाद के लिए गंभीर सुरक्षा चिंता रहा है।

हूतियों ने समय के साथ मिसाइल और ड्रोन क्षमता विकसित की और सऊदी क्षेत्र तथा महत्वपूर्ण आर्थिक एवं ऊर्जा प्रतिष्ठानों पर हमले किए। दूसरी ओर सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने यमन में हूती ठिकानों के खिलाफ बड़े पैमाने पर सैन्य अभियान चलाया।

इस युद्ध ने यमन में भारी मानवीय संकट पैदा किया। संयुक्त राष्ट्र ने लंबे समय से नागरिकों की सुरक्षा और मानवीय सहायता की निर्बाध पहुंच की आवश्यकता पर जोर दिया है।

लाल सागर में हूतियों की रणनीतिक स्थिति
यमन की सबसे बड़ी रणनीतिक ताकतों में से एक उसकी लाल सागर की लंबी समुद्री सीमा है।

विशेष रूप से हुदैदाह (Hodeidah/Hudaydah) बंदरगाह हूतियों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। यह लाल सागर के किनारे स्थित यमन का प्रमुख बंदरगाह है और मानवीय सहायता तथा व्यापार के लिए भी महत्वपूर्ण है।

2018 में यमनी सरकार और सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने हुदैदाह पर नियंत्रण हासिल करने के लिए बड़ा सैन्य अभियान शुरू किया था। संयुक्त राष्ट्र के प्रयासों से दिसंबर 2018 में स्टॉकहोम समझौता हुआ, जिसके तहत हुदैदाह क्षेत्र में संघर्ष कम करने और युद्धविराम की व्यवस्था की गई।

आज हुदैदाह और यमन का पश्चिमी तट इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां से लाल सागर के समुद्री यातायात पर प्रभाव डालने की क्षमता पैदा होती है।

बाब-अल-मंदेब क्यों इतना महत्वपूर्ण है?
यमन के दक्षिण-पश्चिम में स्थित बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य लाल सागर को अदन की खाड़ी से जोड़ता है। इसके आगे लाल सागर के रास्ते जहाज स्वेज नहर तक पहुंचते हैं।

इसलिए एशिया और यूरोप के बीच समुद्री व्यापार के लिए यह बेहद महत्वपूर्ण मार्ग है। हालिया विश्लेषणों के अनुसार यहां अस्थिरता बढ़ने पर जहाजों को अफ्रीका के दक्षिणी छोर यानी केप ऑफ गुड होप के आसपास लंबा रास्ता अपनाना पड़ सकता है, जिससे समय और परिवहन लागत बढ़ती है।

यही कारण है कि हूतियों की लाल सागर के तट पर सैन्य बढ़त केवल यमन या सऊदी अरब का मामला नहीं है—इसका असर अंतरराष्ट्रीय व्यापार और ऊर्जा बाजार पर भी पड़ सकता है।

2023 के बाद हूती क्यों बने वैश्विक समुद्री सुरक्षा का मुद्दा?
अक्टूबर 2023 में इजरायल-हमास युद्ध शुरू होने के बाद हूतियों ने इजरायल और लाल सागर से गुजरने वाले जहाजों के खिलाफ हमले शुरू किए। हूतियों ने इन कार्रवाइयों को फिलिस्तीनियों के समर्थन से जोड़ा।

इसके बाद लाल सागर में कई वाणिज्यिक जहाजों को निशाना बनाया गया। इससे दुनिया की कई बड़ी शिपिंग कंपनियों ने लाल सागर और स्वेज नहर के रास्ते से बचते हुए जहाजों को अफ्रीका के चारों ओर भेजना शुरू किया।

इसका परिणाम वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर पड़ा और समुद्री परिवहन का समय तथा खर्च बढ़ा। हूती हमलों के जवाब में अमेरिका और ब्रिटेन ने भी यमन में हूती ठिकानों पर सैन्य कार्रवाई की।

2026 में फिर क्यों बढ़ा तनाव?
2026 में यमन का संघर्ष एक बार फिर तेजी से अंतरराष्ट्रीय संकट का रूप लेता दिखाई दे रहा है।

सितंबर 2026 की ताजा रिपोर्टों के अनुसार हूती बलों ने यमन के पश्चिमी तट पर अपना सैन्य अभियान तेज किया है। मोखा (Mocha/Mokha) बंदरगाह पर कब्जे के बाद उनका प्रभाव बाब-अल-मंदेब के और करीब पहुंच गया। इसके बाद पेरिम/मयून द्वीप पर नियंत्रण की खबरें भी सामने आईं।

Reuters की 12 सितंबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार हूती बढ़त ने बाब-अल-मंदेब पर संभावित नियंत्रण को लेकर चिंता बढ़ा दी है।

इसका सऊदी अरब के लिए क्या मतलब है?
सऊदी अरब पहले ही यमन युद्ध में लंबे समय तक हूतियों से लड़ चुका है। अब पश्चिमी यमन में हूतियों की नई सैन्य बढ़त का मतलब है कि सऊदी अरब के दक्षिणी समुद्री क्षेत्र और महत्वपूर्ण व्यापार एवं ऊर्जा मार्गों पर दबाव बढ़ सकता है।

हाल के दिनों में हूतियों ने सऊदी अरब के दक्षिणी हिस्सों में मिसाइल और ड्रोन हमले भी किए हैं। रिपोर्टों के अनुसार इन हमलों में ऊर्जा और औद्योगिक प्रतिष्ठानों को नुकसान पहुंचा तथा लोग घायल हुए।

क्या हूतियों ने “सऊदी अरब को हरा दिया”?
इस दावे को सावधानी से समझना जरूरी है।

हूतियों ने सऊदी अरब पर कब्जा नहीं किया है और न ही सऊदी अरब की सरकार को सत्ता से हटा दिया है।

वास्तविकता यह है कि हूती एक यमनी सशस्त्र संगठन हैं, जिन्होंने यमन के बड़े हिस्से पर नियंत्रण कायम किया है और सऊदी अरब तथा उसके सहयोगियों के खिलाफ लंबे समय से युद्ध किया है।

2026 में उनकी नई बढ़त मुख्य रूप से यमन के पश्चिमी तट और लाल सागर के रणनीतिक क्षेत्रों में हुई है। इसलिए “सऊदी अरब को हराकर लाल सागर पर कब्जा” कहना पूरी स्थिति का सटीक वर्णन नहीं है। उपलब्ध रिपोर्टों में बाब-अल-मंदेब के आसपास हूती प्रभाव और खतरे में उल्लेखनीय वृद्धि जरूर बताई गई है।

ईरान की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है?
यमन संघर्ष को समझने में ईरान की भूमिका महत्वपूर्ण है। हूतियों को ईरान से सैन्य, तकनीकी और अन्य प्रकार की सहायता मिलने की रिपोर्टें लंबे समय से सामने आती रही हैं।

Council on Foreign Relations के अनुसार ईरानी समर्थन ने हूतियों की सैन्य क्षमता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वहीं Reuters की हालिया रिपोर्ट में ईरानी हथियारों और सलाहकार सहायता के बारे में क्षेत्रीय स्रोतों के दावे सामने आए हैं।

हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि हूती केवल ईरान के “कठपुतली संगठन” हैं। हूती नेतृत्व और उसकी अपनी राजनीतिक, धार्मिक तथा यमनी प्राथमिकताएं भी हैं। इसलिए इसे ईरान समर्थित लेकिन अपनी स्वतंत्र संगठनात्मक संरचना वाला यमनी आंदोलन कहना अधिक सावधानीपूर्ण है।

दुनिया के लिए खतरा क्यों बढ़ रहा है?
अगर बाब-अल-मंदेब और लाल सागर में लंबे समय तक सैन्य तनाव जारी रहता है, तो इसका प्रभाव कई स्तरों पर पड़ सकता है—

🚢 अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार प्रभावित हो सकता है।
⛽ तेल और गैस की कीमतों में उतार-चढ़ाव बढ़ सकता है।
📦 एशिया-यूरोप माल ढुलाई महंगी हो सकती है।
🚢 जहाजों को अफ्रीका के चारों ओर लंबा रास्ता लेना पड़ सकता है।
🇸🇦 सऊदी अरब की ऊर्जा और समुद्री सुरक्षा पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
🇮🇷 ईरान का क्षेत्रीय रणनीतिक प्रभाव बढ़ सकता है।
🇾🇪 यमन में दोबारा व्यापक गृहयुद्ध का खतरा बढ़ सकता है।

बाब-अल-मंदेब की अहमियत इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि यह स्वेज नहर से जुड़ा समुद्री मार्ग है और एशिया-यूरोप व्यापार के लिए महत्वपूर्ण है।

मानवीय संकट को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता

इस पूरे संघर्ष का सबसे बड़ा नुकसान यमन की आम जनता को हुआ है। वर्षों के युद्ध ने देश की अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य व्यवस्था, खाद्य सुरक्षा और बुनियादी ढांचे को गंभीर नुकसान पहुंचाया है।

संयुक्त राष्ट्र लंबे समय से यह स्पष्ट करता रहा है कि यमन संकट का सैन्य समाधान नहीं, बल्कि राजनीतिक और शांतिपूर्ण समाधान आवश्यक है।

इसलिए लाल सागर में रणनीतिक नियंत्रण की चर्चा करते समय केवल तेल, जहाज और सैन्य शक्ति पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है। इसके केंद्र में लाखों यमनी नागरिकों की सुरक्षा और भविष्य भी है।

हूती आंदोलन आज यमन की राजनीति और मध्य-पूर्व की सुरक्षा व्यवस्था में एक बेहद शक्तिशाली गैर-राज्य अभिनेता बन चुका है। 2014 में सना पर कब्जे से शुरू हुई उसकी सैन्य-राजनीतिक बढ़त ने धीरे-धीरे उसे यमन के बड़े हिस्से और लाल सागर के महत्वपूर्ण क्षेत्रों तक पहुंचाया। 2015 में सऊदी नेतृत्व वाले सैन्य हस्तक्षेप के बावजूद हूतियों को निर्णायक रूप से समाप्त नहीं किया जा सका।

2026 की नई घटनाओं ने इस संघर्ष को एक नए रणनीतिक स्तर पर पहुंचा दिया है। मोखा, पेरिम/मयून और बाब-अल-मंदेब के आसपास हूती गतिविधियां लाल सागर की सुरक्षा और वैश्विक समुद्री व्यापार के लिए गंभीर चिंता बन गई हैं।

लेकिन इसे केवल “हूतियों ने सऊदी अरब को हरा दिया” कहना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा। अधिक सटीक बात यह है कि यमन के हूती बलों ने पश्चिमी यमन और लाल सागर के रणनीतिक क्षेत्रों में अपनी सैन्य स्थिति मजबूत की है, जिससे सऊदी अरब, क्षेत्रीय शक्तियों और अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार पर दबाव बढ़ गया है।

तथ्य-जांच नोट: आपके द्वारा भेजे गए स्क्रीनशॉट में “सऊदी अरब को हराकर लाल सागर के तट पर कब्जा” जैसी भाषा है। इस लेख में उसे अधिक सटीक रूप में प्रस्तुत किया गया है, क्योंकि हूतियों ने सऊदी अरब पर कब्जा नहीं किया है; उनकी सैन्य बढ़त यमन के क्षेत्रों और उसके समुद्री तट/रणनीतिक द्वीपों से संबंधित है।

अस्वीकरण (Disclaimer)
यह लेख उपलब्ध विश्वसनीय एवं सार्वजनिक स्रोतों तथा रिपोर्टों के आधार पर तैयार किया गया है। इसमें यमन के हूती आंदोलन, सऊदी अरब, ईरान और लाल सागर से संबंधित घटनाओं की जानकारी को तथ्यात्मक एवं संतुलित रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है।

अंतरराष्ट्रीय संघर्ष और सैन्य घटनाक्रम तेजी से बदल सकते हैं, इसलिए समय के साथ कुछ जानकारी या स्थिति में बदलाव संभव है। लेख में किसी भी पक्ष के समर्थन या विरोध का उद्देश्य नहीं है। “सऊदी अरब को हराकर लाल सागर पर कब्जा” जैसे वायरल दावों को बिना संदर्भ के तथ्य न माना जाए। पाठकों को सलाह दी जाती है कि महत्वपूर्ण जानकारी के लिए आधिकारिक सरकारी स्रोतों और विश्वसनीय समाचार संस्थानों से भी पुष्टि करें।

Desh Vibe किसी भी गलत, भ्रामक या अपुष्ट दावे के लिए जिम्मेदार नहीं होगा, यदि बाद में उपलब्ध तथ्यों में परिवर्तन या सुधार होता है।

About The Author

Contact Us

कोई सुझाव, खबर या correction भेजना चाहते हैं? हमें संदेश भेजें।

Exit mobile version