
⚫ दूसरों को परेशान करने में मज़ा क्यों आता है? मनोविज्ञान की पेचीदगियाँ
उसे तंग करके मुझे बहुत मज़ा आता है।
पता नहीं क्यों, वह हमेशा मुझे नीचा दिखाने की कोशिश करता है।
क्या आपने कभी ऐसे लोगों को देखा है जो दूसरों को मानसिक या शारीरिक रूप से परेशान करके खुश होते हैं? कभी-कभी यह व्यवहार ऑफिस में सहकर्मी का होता है, तो कभी स्कूल में एक बच्चे का या फिर रिश्तों में पार्टनर का। सवाल उठता है: आखिर कुछ लोगों को दूसरों को दुःख देने में वह “मज़ा” क्यों आता है जो सामान्य मानसिकता वाले व्यक्ति को नहीं आता?
इस विषय पर दिल्ली की प्रसिद्ध मनोचिकित्सक डॉ. प्रेरणा कुकरेती का गहरा मनोवैज्ञानिक विश्लेषण हमें कई ज़रूरी पहलुओं से रूबरू कराता है।
⚫ कुछ लोगों को दूसरों को परेशान करने में मज़ा क्यों आता है?
दिल्ली की मनोचिकित्सक डॉक्टर प्रेरणा कुकरेती के मुताबिक, कुछ लोगों में दूसरों को परेशान करने की प्रवृत्ति पावर और कंट्रोल की भावना से जुड़ी होती है। उन्होंने बताया कि यह व्यवहार कई बार बचपन के अनुभवों से जुड़ा होता है। अगर कोई खुद पहले बुली हुआ हो तो वह बड़ा होकर दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार कर सकता है।
⚫ पहला कारणः पावर और कंट्रोल की भूख (The Need for Power and Control)
डॉ. कुकरेती के अनुसार, इस व्यवहार की जड़ सबसे पहले “सत्ता और नियंत्रण” (Power and Control) की भावना से जुड़ी है। जब एक व्यक्ति दूसरे को परेशान करता है, तो वह मानसिक रूप से यह संदेश देता है: “मैं तुमसे अधिक ताकतवर हूँ। मैं तुम्हारी भावनाओं को नियंत्रित कर सकता हूँ।”
मानव मस्तिष्क में एक गहरी इच्छा होती है कि वह अपने वातावरण पर प्रभाव जमाए। जो लोग आत्म-सम्मान (Self-Esteem) की कमी या असुरक्षा (Insecurity) से ग्रस्त होते हैं, वे अक्सर दूसरों को कुचल कर अपनी श्रेष्ठता साबित करने की कोशिश करते हैं। उनके लिए दूसरे का दर्द ही उनकी ताकत का प्रमाण बन जाता है। उदाहरण के तौर पर, ऑफिस में एक बॉस जो अपने कर्मचारियों को सरेआम शर्मिंदा करता है, वह अपनी असफलताओं को छुपाने के लिए इस पावर का उपयोग कर रहा होता है।
⚫ दूसरा कारणः बचपन के घाव और चक्रव्यूह (Childhood Trauma and the Cycle of Abuse)
यह सबसे गहरा और दिलचस्प पहलू है। डॉ. प्रेरणा कुकरेती बताती हैं कि यह व्यवहार अक्सर बचपन के अनुभवों से जुड़ा होता है।
मनोविज्ञान में इसे ‘रिपीटिशन कम्पल्शन’ (Repetition Compulsion) कहते हैं। जो बच्चा स्वयं बचपन में बुली (परेशान) किया गया होता है, वह उस दर्द को प्रोसेस नहीं कर पाता। बड़ा होकर, वही पीड़ित व्यक्ति अक्सर बुली बन जाता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि
1. सीखा हुआ व्यवहार (Learned Behavior): बच्चा समझता है कि दुनिया में रहना है तो या तो तुम शिकार बनो या शिकारी। उसने देखा है कि ताकतवर व्यक्ति ही दूसरों को परेशान करके खुद को सुरक्षित रखता है।
2. दर्द को पलटना (Reversing the Pain): अपने अंदर के असहाय बच्चे को मारने के लिए, वह दूसरों पर अत्याचार करता है। ऐसा करके वह अस्थायी रूप से राहत महसूस करता है, क्योंकि अब वह परेशान करने वाला (पीड़क) है, परेशान होने वाला (पीड़ित) नहीं।

⚫ तीसरा कारणः सहानुभूति (एम्पैथी) की कमी
जब डॉ. कुकरेती इस व्यवहार पर चर्चा करती हैं, तो वे ‘एम्पैथी डेफिसिट डिसऑर्डर’ की ओर भी इशारा करती हैं। ऐसे लोगों के दिमाग में वह तंत्रिका कोशिकाएँ (Mirror Neurons) सक्रिय नहीं होतीं, जो हमें दूसरे के दर्द को अपना दर्द समझने में मदद करती हैं। उनके लिए दूसरा व्यक्ति मशीन का एक पुर्जा मात्र है। जब वे किसी को रुलाते हैं या परेशान देखते हैं, तो उनके दिमाग में डोपामाइन (खुशी का हार्मोन) रिलीज़ होता है, जबकि एक सामान्य व्यक्ति के दिमाग में यही दृश्य कोर्टिसोल (तनाव हार्मोन) रिलीज करेगा।
⚫ क्या ऐसे लोगों को बदला जा सकता है?
डॉ. कुकरेती के क्लीनिकल अनुभवों के अनुसार, यदि यह व्यवहार बचपन के आघात से उपजा है, तो थेरेपी (CBT -कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी) और परामर्श के माध्यम से इसमें सुधार किया जा सकता है। लेकिन इसके लिए ज़रूरी है कि व्यक्ति खुद बदलाव चाहे। यदि कोई व्यक्ति नार्सिसिस्टिक (आत्ममुग्ध) या सोशियोपैथिक प्रवृत्ति का है, तो उसका यह “मज़ा” दूसरों के लिए बहुत खतरनाक साबित हो सकता है।
दूसरों को परेशान करने वाला व्यक्ति असल में एक दयनीय मानसिकता का शिकार होता है। वह या तो अपनी असुरक्षा को छुपा रहा होता है, या बचपन के दर्द को दूसरों पर उड़ेल रहा होता है। डॉ. प्रेरणा कुकरेती की मानें तो इस व्यवहार को समझना ज़रूरी है, लेकिन इसे माफ करना या सहन करना ज़रूरी नहीं है। यदि आप किसी ऐसे व्यक्ति से घिरे हैं जिसे आपको परेशान करने में मज़ा आता है, तो दूरी बनाना और अपनी मानसिक सीमाएं (Boundaries) तय करना ही सबसे बड़ा उपाय है।
क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है? नीचे कमेंट में अपना अनुभव ज़रूर साझा करें।
(यह पोस्ट केवल सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए है। यदि आप या आपका कोई परिचित इस प्रकार के मानसिक दबाव से गुजर रहा है, तो कृपया किसी योग्य मनोचिकित्सक से संपर्क करें।)