
तेहरान से सीधा संदेश – मध्य पूर्व में तनाव एक बार फिर चरम पर
हाल के दिनों में मध्य पूर्व का क्षेत्र एक बार फिर उथल-पुथल में है। ईरान ने इजरायल को खुली चेतावनी देते हुए लेबनान में अपने “बहनों और भाइयों” की रक्षा करने की बात कही है। साथ ही, होर्मुज जलडमरूमध्य में नई पाबंदियां लगाने का ऐलान किया गया है। इस कदम ने पूरे विश्व की निगाहें एक बार फिर इस रणनीतिक क्षेत्र पर टिका दी हैं।
क्या है पूरा मामला?
ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के एक करीबी सलाहकार ने हाल ही में कहा कि “लेबनान में हमारे बहन और भाई हमारी सीमा हैं। उन्हें अकेला नहीं छोड़ा जा सकता।” यह बयान ऐसे समय आया है जब इजरायल और लेबनान के हिजबुल्लाह समूह के बीच सीमा पार हमले लगातार बढ़ रहे हैं।
ईरान ने साफ शब्दों में कहा है कि अगर इजरायल ने लेबनान या सीरिया में ईरानी ठिकानों पर हमले जारी रखे, तो जवाब बहुत कड़ा होगा।
होर्मुज जलडमरूमध्य में नई पाबंदी – क्यों है ये
इतना महत्वपूर्ण ?
ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य में अपनी सैन्य उपस्थिति बढ़ा दी है और यहां से गुजरने वाले जहाजों पर नई पाबंदियां लगा दी हैं। बता दें कि दुनिया के कुल तेल उत्पादन का लगभग 20% इसी जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है। यानी यहां कोई भी संकट वैश्विक अर्थव्यवस्था पर सीधा असर डाल सकता है।
ईरान ने पहले भी कई बार धमकी दी थी कि अगर उसके हितों को नुकसान पहुंचाया गया तो वह होर्मुज को बंद कर सकता है। अब उसने कुछ श्रेणियों के जहाजों के लिए आवाजाही पर रोक लगा दी है, जिससे अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार में दिक्कतें आ सकती हैं।
इजरायल की प्रतिक्रिया क्या होगी?
इजरायल ने अब तक आधिकारिक तौर पर कोई बयान तो नहीं दिया है, लेकिन सुरक्षा सूत्रों के अनुसार, इजरायल अपनी वायु सेना और खुफिया एजेंसियों को हाई अलर्ट पर रखा है। अमेरिका ने भी इस मामले पर चिंता जताई है और कहा है कि वह इजरायल के साथ खड़ा है।
क्या होगा वैश्विक असर?
👉 तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं- होर्मुज में पाबंदी का सीधा असर क्रूड ऑयल की कीमतों पर पड़ेगा।
👉 भारत जैसे देशों को झटका – भारत अपनी तेल जरूरतों
का एक बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से आयात करता है।
👉 भू-राजनीतिक तनाव बढ़ेगा – चीन, रूस और यूरोपीय देश इस मामले में बीच-बचाव की कोशिश कर सकते हैं।
‘ईरान के पास तैनात रहेगी सेना’, ट्रंप ने NATO को क्यों लताड़ा?
नई दिल्ली/वाशिंगटन: मध्य पूर्व में ईरान के साथ दो हफ्ते
के युद्धविराम के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपना अगला निशाना NATO पर साधा है। हाल ही में व्हाइट हाउस में NATO प्रमुख मार्क रुटे के साथ हुई बंद कमरे की बैठक के बाद ट्रंप ने साफ कहा कि वह गठबंधन से बेहद निराश हैं। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर लिखा, “जब हमें NATO की जरूरत थी, तब वे हमारे साथ नहीं थे, और अगर हमें दोबारा उनकी जरूरत पड़ी, तो वे होंगे भी नहीं।”
यह तीखा बयान उस वक्त आया है जब ट्रंप ने ईरान के खिलाफ ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ के दौरान यूरोपीय सहयोगियों से अपेक्षित समर्थन न मिलने पर उन्हें ‘पेपर टाइगर’ (कागज का शेर) तक बता डाला। आइए, पूरे मामले को विस्तार से समझते हैं।
क्या है मामला? ट्रंप को क्यों गुस्सा आया?
दरअसल, अमेरिका और इजरायल ने हाल ही में ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई शुरू की थी। इस दौरान ट्रंप प्रशासन को उम्मीद थी कि NATO के यूरोपीय सदस्य देश पूरे हाथ से सहयोग करेंगे। लेकिन कई देशों ने सहयोग करने से साफ इनकार कर दिया
व्हाइट हाउस की प्रेस सेक्रेटरी करोलिन लेविट ने ट्रंप के हवाले से कहा, “NATO को टेस्ट किया गया, और वे फेल हो गए।” उन्होंने यह भी कहा कि NATO देशों ने “अमेरिकी लोगों से मुंह मोड़ लिया है।”
इस नाराजगी की वजह यह है कि कई यूरोपीय देशों ने अमेरिकी सैन्य अभियान को समर्थन देने से इनकार कर दिया:
⚫ स्पेन ने अमेरिकी सैन्य विमानों को अपने हवाई क्षेत्र से गुजरने की अनुमति नहीं दी
⚫ जर्मनी ने सार्वजनिक रूप से इस युद्ध की आलोचना की
⚫ इटली और फ्रांस ने अमेरिकी सैन्य ठिकानों के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दिया
हालांकि, पोलैंड, रोमानिया, लिथुआनिया और ग्रीस ने सहयोग किया, जिसके चलते ट्रंप अब इन देशों में अपनी सेना बढ़ाने की योजना बना रहे हैं

‘ईरान के पास तैनात रहेगी सेना’ का क्या मतलब है?
ट्रंप ने साफ किया है कि जब तक ईरान परमाणु महत्वाकांक्षाओं को स्थायी रूप से नहीं छोड़ देता, अमेरिकी सेना क्षेत्र में मौजूद रहेगी 4 । उन्होंने दावा किया कि अमेरिकी सेना ने ईरानी सैन्य नेतृत्व को लगभग खत्म कर दिया है – ईरान की वायु सेना, ड्रोन और मिसाइल उत्पादन सुविधाओं को निशाना बनाया गया है
ट्रंप ने यह भी कहा कि यदि ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य में व्यवधान जारी रखा, तो अमेरिका “बहुत कठोर कदम” उठाएगा। साथ ही उन्होंने ईरान के लिए कूटनीतिक रास्ता भी खुला रखा है – “ईरान के पास अपनी परमाणु महत्वाकांक्षाओं को स्थायी रूप से त्यागने का मौका है। यदि वे ऐसा नहीं करते, तो हम उनके लिए सबसे बुरा सपना हैं।”
NATO से नाराजगी के पीछे असली वजह क्या है?
ट्रंप की नाराजगी के पीछे तीन बड़ी वजहें हैं:
1. होर्मुज जलडमरूमध्य का मुद्दा
ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को प्रभावी रूप से बंद कर दिया था। यह दुनिया के कुल तेल उत्पादन का लगभग 20% का रास्ता है। ट्रंप चाहते थे कि NATO देश समुद्री मार्ग खोलने के लिए सेना भेजें, लेकिन जब तक युद्ध जारी था, यूरोपीय देश इसके लिए तैयार नहीं थे
2. बोझ का बंटवारा (Burden Sharing)
ट्रंप का लंबे समय से कहना है कि यूरोपीय देश अपनी सुरक्षा पर पर्याप्त खर्च नहीं करते हैं और अमेरिकी सुरक्षा छत्र पर निर्भर रहते हैं। उन्होंने कहा, “हम उनकी मदद के लिए आएंगे, लेकिन वे कभी हमारी मदद के लिए नहीं आएंगे।”
3. व्यापक भू-राजनीतिक तनाव
ईरान युद्ध ने पहले से मौजूद तनाव को और बढ़ा दिया है। ट्रंप ने ग्रीनलैंड को लेकर भी तीखी टिप्पणी की है, जो डेनमार्क (एक NATO सदस्य) का क्षेत्र है। उन्होंने ग्रीनलैंड को “बर्फ का बड़ा, खराब प्रबंधित टुकड़ा” कहा
अब क्या होगा? जवाबी कार्रवाई की तैयारी
सबसे चौंकाने वाली खबर यह है कि ट्रंप प्रशासन उन NATO देशों के खिलाफ जवाबी कार्रवाई की समीक्षा कर रहा है, जिन्होंने सहयोग नहीं किया। वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के अनुसार, इन कदमों पर विचार चल रहा है
👉 सैनिकों की वापसी: जिन देशों ने सहयोग नहीं किया, वहां
से अमेरिकी सैनिक हटाकर सहयोगी देशों (पोलैंड, ग्रीस आदि) में तैनात किए जाएंगे।
👉 सैन्य ठिकाने बंद करनाः कुछ यूरोपीय देशों में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को बंद करने की योजना है।
👉 NATO से बाहर निकलना: ट्रंप ने NATO छोड़ने की
धमकी देना जारी रखा है
हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि NATO से बाहर निकलना इतना आसान नहीं है। अमेरिकी कानून के तहत राष्ट्रपति को एकतरफा NATO छोड़ने के लिए सीनेट के दो-तिहाई बहुमत या कांग्रेस के अधिनियम की आवश्यकता होती है
मार्क रुटे की प्रतिक्रियाः ‘न्यूडेड पिक्चर’
NATO प्रमुख मार्क रुटे, जिन्हें ‘ट्रंप व्हिस्परर’ (ट्रंप को मनाने वाला) भी कहा जाता है, ने मामले को शांत करने की कोशिश की
सीएनएन को दिए इंटरव्यू में रुटे ने कहा, “वह कई NATO सहयोगियों से स्पष्ट रूप से निराश हैं, और मैं उनकी बात समझ सकता हूं।” लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि “बड़े बहुमत वाले यूरोपीय देश” सहायक रहे हैं – उन्होंने बेसिंग, लॉजिस्टिक्स और ओवरफ्लाइट्स में मदद की
रुटे ने कहा कि तस्वीर ‘न्यूडेड’ (बारीक) है – कुछ देश फेल हुए, लेकिन अधिकांश ने अपनी जिम्मेदारी निभाई
क्या यह गठबंधन के लिए ‘खतरनाक मोड़’ है?
पूर्व NATO प्रवक्ता ओआना लुंगेस्कु ने इस स्थिति को ट्रांस-अटलांटिक गठबंधन के लिए एक ‘खतरनाक मोड़’ बताया है इस तनाव के कई दूरगामी परिणाम हो सकते हैं:
1. NATO की विश्वसनीयता पर सवालः ट्रंप के ‘पेपर
टाइगर’ जैसे शब्दों ने गठबंधन की मूल विश्वसनीयता को ही चुनौती दी है।
2. यूक्रेन पर असरः अमेरिकी हथियार अब ईरान की तरफ
मोड़े जा रहे हैं, जिससे यूक्रेन को रूस के खिलाफ मिलने वाली सहायता पर प्रभाव पड़ सकता है
3. अमेरिका-यूरोप रिश्तों में दरार: पिछले 75 वर्षों से अमेरिका और यूरोप के बीच सुरक्षा का जो ताना-बाना रहा है, वह पहली बार इतनी गंभीर रूप से चरमराता दिख रहा है
निष्कर्ष
ईरान के साथ युद्धविराम के बाद ट्रंप का NATO पर हमला कोई अलग घटना नहीं है, बल्कि उनकी ‘अमेरिका फर्स्ट’ सोच का ही एक हिस्सा है। उनका मानना है कि अमेरिका को ऐसे गठबंधनों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए जो संकट के समय साथ न दें।
हालांकि, यह स्थिति पश्चिमी दुनिया के लिए एक बड़ी चुनौती है। क्या NATO इस तनाव से उबर पाएगा? क्या ट्रंप वाकई गठबंधन छोड़ देंगे? या मार्क रुटे जैसे कूटनीतिज्ञ उन्हें मना लेंगे? फिलहाल, सबकी निगाहें वाशिंगटन और ब्रसेल्स पर टिकी हैं।
लेकिन एक बात तय है – अमेरिकी सेना ईरान के आसपास तब तक तैनात रहेगी, जब तक तेहरान अपनी परमाणु महत्वाकांक्षाओं को पूरी तरह नहीं छोड़ देता। और NATO को अपनी असली ताकत साबित करने का एक और मौका मिल गया है – या फिर ‘पेपर टाइगर’ साबित होने का डर सच हो जाएगा।
ईरान की यह चेतावनी और होर्मुज में पाबंदी सिर्फ एक क्षेत्रीय विवाद नहीं है, बल्कि यह वैश्विक शक्ति संतुलन को बदलने का संकेत है। अब देखना यह होगा कि इजरायल और अमेरिका इस पर कैसी प्रतिक्रिया देते हैं। क्या यह तनाव एक बड़े युद्ध में बदलेगा या कूटनीति के जरिए मामला शांत हो जाएगा? फिलहाल, पूरी दुनिया की निगाहें तेहरान, तेल अवीव और होर्मुज जलडमरूमध्य पर टिकी हैं।