
भारत और अफगानिस्तान
जब वैश्विक स्वास्थ्य संकटों और महामारियों की बात आती है,
तो कोई भी देश अकेले में सुरक्षित नहीं है। विशेषकर पड़ोसी
देशों के बीच, स्वास्थ्य सुरक्षा का आपसी गहरा संबंध होता
है। भारत ने हमेशा इस सिद्धांत को आत्मसात किया है। ताज़ा
उदाहरण अफगानिस्तान को भारत द्वारा 13 टन बीसीजी
(BCG) वैक्सीन की डोज़ भेजना है। यह सिर्फ एक सहायता
कार्यक्रम नहीं है, बल्कि दो देशों के बीच एक बीमारी को जड़
से खत्म करने की साझा प्रतिबद्धता है। आइये, इस ऐतिहासिक
निर्णय और उसके प्रभाव को विस्तार से समझते हैं।
1. सहायता का परिमाणः 13 टन वैक्सीन का क्या मतलब है?
13 टन का आंकड़ा सिर्फ वजन नहीं, बल्कि करोड़ों बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की ओर इशारा करता है। BCG वैक्सीन (बैसिलस कैलमेट-गुएरिन) दुनिया भर में तपेदिक (TB) से बचाव का सबसे पुराना और प्रभावी टीका है। यह विशेष रूप से नवजात शिशुओं और छोटे बच्चों को टीबी के गंभीर रूपों (जैसे माइलरी टीबी और टीबी मेनिन्जाइटिस) से बचाता है।
अफगानिस्तान जैसे संघर्षग्रस्त देश में, जहाँ स्वास्थ्य अवसंरचना लगभग चरमरा गई है, वहाँ टीकाकरण अभियान को मज़बूत करना जीवन और मृत्यु का सवाल है। भारत की यह खेप अफगानिस्तान के ‘राष्ट्रीय क्षय रोग उन्मूलन कार्यक्रम’ को मजबूत करने में मील का पत्थर साबित होगी।
2. क्यों जरूरी थी यह मदद? अफगानिस्तान का संकट
अफगानिस्तान दशकों से गृह युद्ध, आर्थिक अस्थिरता और प्राकृतिक आपदाओं का सामना कर रहा है। तालिबान शासन के बाद, अंतरराष्ट्रीय सहायता में कटौती ने वहाँ के स्वास्थ्य तंत्र को लगभग ध्वस्त कर दिया है। इस स्थिति में:
👉 टीबी के मरीजों की पहचान और इलाज बेहद चुनौतीपूर्ण हो गया है।
👉 नवजात शिशुओं तक नियमित टीकाकरण नहीं पहुँच पा रहा है, जिससे अन्य बीमारियों के प्रकोप का खतरा बढ़ जाता है।
👉 पोलियो जैसी बीमारियाँ पहले से ही वहाँ एंडेमिक हैं, ऐसे में टीबा का खतरा और भी गंभीर हो जाता है।
भारत की यह वैक्सीन उस समय आई है जब अफगानिस्तान को इसकी सबसे अधिक आवश्यकता थी।
3. ‘नेबरहुड फर्स्ट’ नीतिः भारत की विदेश नीति की रीढ़
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता श्री रंधीर जायसवाल ने स्पष्ट किया कि यह डिलीवरी भारत की ‘नेबरहुड फर्स्ट’ (पड़ोसी पहले) नीति का हिस्सा है। यह नीति क्या कहती है?
👉 सबसे पहले अपने पड़ोसियों की जरूरतों का ध्यान रखो।
👉 सिर्फ राजनयिक संबंध नहीं, बल्कि मानवीय संबंधों को प्राथमिकता दो।
👉 संकट के समय बिना किसी शर्त के सहायता प्रदान करो।
भारत पहले भी अफगानिस्तान को गेहूं, दवाइयाँ और कोविड-19 वैक्सीन भेज चुका है। यह BCG वैक्सीन की खेप उसी कड़ी में एक और मजबूत कड़ी है। यह साबित करता है कि भारत केवल अपने विकास की नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के स्वास्थ्य और स्थिरता की सोचता है।
4. भारत की TB उन्मूलन यात्रा और वैश्विक नेतृत्व
भारत ने वर्ष 2025 तक टीबी मुक्त होने का लक्ष्य रखा है (जो संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य 2030 से पांच साल पहले है)। इसके तहतः
👉 ‘निक्षय पोषण योजना’ जैसी योजनाएँ मरीजों को पोषण सहायता देती हैं।
👉 मुफ्त दवाइयाँ और नैदानिक सुविधाएँ।
👉 उच्च गुणवत्ता वाली BCG वैक्सीन का उत्पादन।
भारत ‘वैश्विक टीबी महामारी’ को समाप्त करने में अग्रणी भूमिका निभा रहा है। अफगानिस्तान को वैक्सीन भेजकर, भारत यह सुनिश्चित करना चाहता है कि उसकी सीमा से लगे क्षेत्रों में भी टीबी का खतरा कम हो, ताकि दोनों देशों की आने वाली पीढ़ियाँ सुरक्षित रह सकें।
5. भारत-अफगानिस्तान के स्वास्थ्य संबंधः एक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
यह पहली बार नहीं है जब भारत ने अफगानिस्तान के स्वास्थ्य क्षेत्र में हाथ बढ़ाया हो। पिछले दो दशकों में:
👉 भारत ने काबुल के ‘इंदिरा गांधी चिल्ड्रन हॉस्पिटल’ का पुनर्निर्माण किया, जो अफगानिस्तान का सबसे बड़ा बच्चों का अस्पताल है।
👉 सैकड़ों अफगान छात्रों को भारत में मेडिकल ट्रेनिंग दी गई।
👉 कोविड महामारी के दौरान भारत ने अफगानिस्तान को दवाइयाँ और वैक्सीन सबसे पहले भेजी थीं।

⚫ निष्कर्षः एक स्वस्थ पड़ोसी, एक सुरक्षित भारत
भारत द्वारा 13 टन BCG वैक्सीन भेजना केवल एक राजनयिक इशारा नहीं है, बल्कि यह एक व्यावहारिक और सार्थक प्रयास है। टीबी जैसी बीमारी सीमाएँ नहीं देखती। यदि अफगानिस्तान में बच्चे टीबी से सुरक्षित रहेंगे, तो इस क्षेत्र में बीमारी के प्रसार का खतरा स्वतः ही कम हो जाएगा।
भारत एक बार फिर साबित कर रहा है कि वह ‘वसुधैव कुटुम्बकम्‘ (पूरी दुनिया एक परिवार है) में विश्वास रखता है। उम्मीद है, यह वैक्सीन खेप अफगान बच्चों के लिए सुरक्षा कवच का काम करेगी, और एक दिन हम एक ‘टीबी मुक्त दक्षिण एशिया’ देख पाएंगे।
नोट: आपकी राय क्या है? क्या भारत को अन्य पड़ोसी देशों को भी इसी तरह की स्वास्थ्य सहायता बढ़ानी चाहिए? कमेंट में जरूर बताइए।