
डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो (DRC) अफ्रीका का ऐसा देश है जिसके पास दुनिया के कई बेहद महत्वपूर्ण खनिजों के बड़े भंडार हैं। कोबाल्ट, तांबा, टैंटलम, टिन, सोना, जस्ता और अन्य खनिजों के कारण आज कांगो वैश्विक अर्थव्यवस्था और खासकर इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी, इलेक्ट्रॉनिक्स तथा रक्षा उद्योग के लिए रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण बन गया है। इसके बावजूद देश की बड़ी आबादी गरीबी में जीवन जी रही है। विश्व बैंक के अनुसार DRC अभी भी दुनिया के पांच सबसे गरीब देशों में शामिल है।
कांगो के पास आखिर इतना खनिज क्यों है?
DRC के दक्षिणी हिस्से में स्थित Copperbelt दुनिया के महत्वपूर्ण तांबा-कोबाल्ट क्षेत्रों में से एक है। इसके अलावा देश के पूर्वी हिस्सों में टिन, टैंटलम और टंग्स्टन जैसे खनिज मिलते हैं।
अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण USGS के अनुसार 2024 में DRC दुनिया का सबसे बड़ा कोबाल्ट उत्पादक था और वैश्विक कोबाल्ट उत्पादन में उसका अनुमानित हिस्सा करीब 75% था। उसी वर्ष वह टैंटलम का भी दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक था, जिसका वैश्विक उत्पादन में हिस्सा लगभग 51% था। DRC दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा औद्योगिक हीरा उत्पादक और खनन किए गए तांबे का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक भी था।
2024 में DRC ने लगभग 2.99 मिलियन टन खनन किया हुआ तांबा और करीब 226,000 टन कोबाल्ट उत्पादित किया।
फिर अमेरिका और चीन की नजर कांगो पर क्यों है?
इसका सबसे बड़ा कारण है Critical Minerals यानी ऐसे खनिज जो आधुनिक उद्योग, ऊर्जा, इलेक्ट्रॉनिक्स और रक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
कोबाल्ट का इस्तेमाल बैटरी निर्माण में होता है। तांबा बिजली के तारों, इलेक्ट्रिक वाहनों, बिजली ग्रिड और इलेक्ट्रॉनिक्स में महत्वपूर्ण है। टैंटलम का उपयोग इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में होता है, जबकि टिन और टंग्स्टन भी विभिन्न औद्योगिक तथा तकनीकी क्षेत्रों में इस्तेमाल होते हैं।
यही कारण है कि कांगो के खनिज केवल अफ्रीका के लिए ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए रणनीतिक महत्व रखते हैं।
चीन की पकड़ इतनी मजबूत कैसे हुई?
चीन लंबे समय से DRC के खनन क्षेत्र में बड़ी भूमिका निभाता आया है। USGS के अनुसार 2024 में चीन कांगो के प्रमुख निर्यात साझेदारों में शामिल था और तांबा, कोबाल्ट, टैंटलम, टिन तथा अन्य खनिजों का बड़ा हिस्सा चीन जाता था।
चीन की ताकत केवल खनिज खरीदने तक सीमित नहीं है। चीनी कंपनियों की कांगो में खनन परियोजनाओं और उत्पादन में भी महत्वपूर्ण हिस्सेदारी है।
उदाहरण के लिए, चीनी कंपनी CMOC Group की Tenke Fungurume और Kisanfu खदानों ने 2024 में मिलकर लगभग 6.50 लाख टन तांबा और 1.14 लाख टन कोबाल्ट का उत्पादन किया। इसी तरह Kamoa-Kakula परियोजना में चीन की Zijin Mining और कनाडा की Ivanhoe Mines की भागीदारी है।
यानी चीन ने केवल कच्चा माल खरीदने के बजाय खनन और उत्पादन की श्रृंखला में भी मजबूत स्थिति बनाई है।

अमेरिका अब क्यों सक्रिय हो रहा है?
अमेरिका के लिए चुनौती यह है कि महत्वपूर्ण खनिजों की वैश्विक सप्लाई चेन में चीन की भूमिका बहुत मजबूत है। इसलिए अमेरिका कांगो जैसे खनिज-संपन्न देशों के साथ अपने संबंध और निवेश बढ़ाकर सप्लाई के स्रोतों को विविध बनाना चाहता है।
अमेरिकी सरकार और DRC के बीच दिसंबर 2025 में Strategic Partnership Agreement हुआ था, जिसमें महत्वपूर्ण खनिजों की अमेरिकी सप्लाई चेन को अधिक विविध बनाने से संबंधित प्रावधान शामिल थे।
इसका अर्थ यह नहीं है कि अमेरिका अचानक चीन को कांगो से बाहर कर रहा है। बल्कि अमेरिका चाहता है कि महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति के लिए उसके पास भी मजबूत और विश्वसनीय स्रोत हों।
53,290 टन तांबे वाली खबर में एक जरूरी सुधार
आपके दिए गए स्क्रीनशॉट में लिखा है कि अमेरिका ने 2026 के पहले छह महीनों में कांगो से 53,290 टन तांबा खरीदा। उपलब्ध ताजा Reuters रिपोर्ट के अनुसार यह आंकड़ा जुलाई 2026 के एक महीने का है, न कि जनवरी-जून के छह महीनों का। जुलाई 2026 में अमेरिका ने DRC से रिकॉर्ड 53,290 मीट्रिक टन तांबा आयात किया। उस महीने अमेरिका के कुल तांबा आयात में DRC की हिस्सेदारी करीब 23.9% रही।
Reuters के मुताबिक जुलाई में चीन ने DRC से लगभग 95,778 टन तांबा आयात किया। यानी चीन अभी भी कांगो के तांबे का बहुत बड़ा खरीदार बना हुआ है, हालांकि अमेरिकी खरीद तेजी से बढ़ रही है।
इसलिए यह कहना ज्यादा सही होगा कि अमेरिका कांगो के खनिज बाजार में तेजी से अपनी मौजूदगी बढ़ा रहा है, जबकि चीन पहले से ही मजबूत स्थिति में है।
इतनी खनिज संपदा के बावजूद कांगो गरीब क्यों है?
यही इस कहानी का सबसे बड़ा सवाल है।
किसी देश के पास प्राकृतिक संसाधन होना अपने-आप में समृद्धि की गारंटी नहीं है। DRC में लंबे समय से गरीबी, कमजोर संस्थागत व्यवस्था, सुरक्षा संकट, बुनियादी ढांचे की कमी और आर्थिक विविधीकरण की समस्या रही है।
विश्व बैंक के अनुसार 2025 में लगभग 81.1% आबादी $3 प्रतिदिन की गरीबी रेखा के नीचे थी। विश्व बैंक यह भी बताता है कि खनन क्षेत्र में उच्च आर्थिक गतिविधि के बावजूद रोजगार सृजन सीमित रहा है और आर्थिक विकास का लाभ पर्याप्त रूप से व्यापक आबादी तक नहीं पहुंच पाया है।
IMF भी DRC की अर्थव्यवस्था को खनिजों पर काफी निर्भर बताता है और कहता है कि देश की बड़ी प्राकृतिक संपदा के बावजूद गरीबी और सुरक्षा संबंधी चुनौतियां बनी हुई हैं।
असली समस्या: कच्चा माल बनाम वैल्यू एडिशन
कांगो के लिए सबसे महत्वपूर्ण चुनौती केवल अधिक खनिज निकालना नहीं, बल्कि खनिजों की पूरी वैल्यू चेन अपने देश में विकसित करना है।
यदि कोई देश केवल अयस्क या कच्चा खनिज बेचता है, तो उसे पूरी आर्थिक कीमत नहीं मिलती। इसके मुकाबले खनिज को देश में ही प्रोसेस करके, रिफाइन करके और उससे बैटरी, इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट या अन्य तैयार उत्पाद बनाकर अधिक रोजगार और राजस्व पैदा किया जा सकता है।
यही कारण है कि DRC अब अपने खनिज संसाधनों पर ज्यादा नियंत्रण और स्थानीय प्रसंस्करण बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। हाल की रिपोर्टों के अनुसार सरकार भू-वैज्ञानिक डेटा और खनिज संसाधनों पर अपना नियंत्रण मजबूत करने की दिशा में भी काम कर रही है।
कांगो की कहानी वास्तव में “गरीब देश बनाम अमीर देश” की कहानी नहीं है। यह प्राकृतिक संसाधनों, वैश्विक सप्लाई चेन और भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा की कहानी है।
DRC के पास कोबाल्ट, तांबा, टैंटलम और अन्य महत्वपूर्ण खनिजों की विशाल क्षमता है। चीन ने लंबे समय से वहां खनन और खरीद में मजबूत स्थिति बनाई हुई है, जबकि अमेरिका अब अपनी सप्लाई चेन को चीन पर कम निर्भर बनाने के लिए कांगो के साथ संबंध मजबूत कर रहा है।

लेकिन कांगो के लिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि इन खनिजों से पैदा होने वाली संपदा का कितना हिस्सा आम कांगोली नागरिकों तक पहुंचेगा। यदि देश खनिजों के साथ-साथ स्थानीय प्रोसेसिंग, उद्योग, रोजगार, बुनियादी ढांचे और पारदर्शी राजस्व व्यवस्था विकसित करता है, तो यही खनिज उसकी गरीबी कम करने और अर्थव्यवस्था बदलने का बड़ा माध्यम बन सकते हैं।
तथ्य-जांच नोट: आपके स्क्रीनशॉट में दिए 53,290 टन के आंकड़े को मैंने ताजा Reuters रिपोर्ट के अनुसार सुधारा है—यह जुलाई 2026 में एक महीने का अमेरिकी आयात था, पहले छह महीनों का कुल आंकड़ा नहीं।



