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UP में युवती से 12 दिन तक रेप, फिर गैंगरेप: पुलिस को क्यों संदिग्ध लग रहा मामला?

Yk Pasha 3 months ago 1 minute read 0 comments
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UP में युवती से 12 दिन तक रेप, फिर गैंगरेप: पुलिस को क्यों संदिग्ध लग रहा मामला?

उत्तर प्रदेश के आगरा से एक बेहद चौंकाने वाला और दिल दहला देने वाला मामला सामने आया है। एक युवती ने आरोप लगाया कि उसके फेसबुक फ्रेंड ने उसे होटल में बंद कर 12 दिनों तक रेप किया। जब वह किसी तरह भाग निकली, तो एक ऑटो ड्राइवर और उसके दो साथियों ने उसके साथ गैंगरेप किया और अर्धनग्न हालत में सड़क किनारे फेंक दिया। लेकिन इस पूरे मामले में पुलिस का बयान आया है- “मामला संदिग्ध है।” आइए जानते हैं पूरी कहानी और इसके पीछे की जटिलताएं।

⚫ क्या है पूरा मामला?

पीड़ित युवती के अनुसारः

1. फेसबुक दोस्ती से शुरू हुआ सिलसिला – उसकी
मुलाकात एक युवक से फेसबुक पर हुई। दोस्ती बढ़ी, फिर मुलाकात का प्लान बना।

2. होटल में कैद और 12 दिन का रेप- आरोपी ने उसे
आगरा के एक होटल में बुलाया, जहां उसे बंद कर रखा गया। आरोप है कि 12 दिनों तक उसके साथ बार-बार रेप किया गया।

3. भागते ही फिर मुसीबत – किसी तरह होटल से भागी तो
रात के अंधेरे में एक ऑटो किया। ऑटो ड्राइवर ने उसकी हालत देखी और दोस्तों के साथ मिलकर उसके साथ गैंगरेप किया।

4. अर्धनग्न हालत में फेंका – घटना के बाद उसे अर्धनग्न
अवस्था में कहीं फेंक दिया गया।

⚫ पुलिस को क्यों लग रहा ‘संदिग्ध’?

पुलिस के अनुसार, पीड़िता के बयानों में विरोधाभास है:

👉 कभी वह आरोपी को पति बता रही है, तो कभी बॉयफ्रेंड।

👉 पुलिस का कहना है कि मामले में कई तथ्य जांचे जाने बाकी हैं।

👉 होटल में 12 दिन रहने के दौरान उसने किसी से मदद क्यों नहीं मांगी? यह सवाल भी पुलिस के मन में है।

हालांकि, इस तरह के बयान पर कई लोगों ने सवाल उठाए हैं। आलोचकों का कहना है कि रेप पीड़िता अक्सर डर, शर्म, या स्टॉकहोम सिंड्रोम की वजह से विरोधाभासी बयान देती हैं। ऐसे में पुलिस को तुरंत ‘संदिग्ध’ लेबल नहीं लगाना चाहिए।

⚫ क्या कहते हैं कानून और सबूत ?

👉 भारतीय कानून (अब BNS, पहले IPC) के तहत रेप और गैंगरेप के आरोप गंभीर हैं।

👉 पुलिस को मेडिकल जांच, होटल के सीसीटीवी, ऑटो ड्राइवर की पहचान, और पीड़िता के बयान का गंभीरता से परीक्षण करना चाहिए।

👉 ‘पति’ या ‘बॉयफ्रेंड’ कहने से रेप का अपराध खत्म नहीं हो जाता। सुप्रीम कोर्ट भी मान चुका है कि पति भी पत्नी का रेप कर सकता है (हालांकि वैवाहिक बलात्कार अभी अपराध नहीं है, लेकिन मामले में अलग तरह से दाखिल हो सकता है)।

⚫ ऐसे मामलों में पुलिस का रवैया क्यों बनता है संदेहास्पद ?

भारत में कई रेप मामलों में पुलिस की प्रारंभिक प्रतिक्रिया होती है- “मामला संदिग्ध”, “लड़की ने खुद बुलाया था”, “इतने दिन तक कैसे रहीं?”। यह रवैयाः

📍 पीड़िताओं को आगे बयान देने से डराता है

📍 अपराधियों को मानसिक सुरक्षा देता है

📍 न्याय की प्रक्रिया को धीमा करता है

कई बार पीड़िता पहले तो अपने शोषण को ‘रिश्ता’ कहकर नकारती है, बाद में सच्चाई सामने आती है। पुलिस को ‘ट्रॉमा इंफॉर्ड’ दृष्टिकोण से जांच करनी चाहिए, न कि पीड़िता पर ही संदेह करना शुरू कर देना चाहिए।

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यह मामला दोहरी त्रासदी लिए हुए है – पहले होटल में 12 दिनों का कैद और रेप, फिर मदद के लिए रोकी ऑटो से ही गैंगरेप। अगर पीड़िता के आरोप सच हैं, तो यह न सिर्फ घिनौना अपराध है, बल्कि पुलिस की संवेदनशीलता पर भी सवालिया निशान है।

ज़रूरत इस बात की है कि जांच तेजी से हो, पीड़िता का मेडिकल और मनोवैज्ञानिक परीक्षण कराया जाए, संदिग्ध ऑटो ड्राइवर और फेसबुक फ्रेंड को गिरफ्तार किया जाए, और अगर आरोप झूठे निकलें तो कानून झूठी रिपोर्ट का भी संज्ञान ले। लेकिन शुरुआत में ही पीड़िता को ‘संदिग्ध’ बताकर पुलिस जो हवा बना रही है, वह सही नहीं है।

हर पीड़िता को न्याय दिलाना राज्य की जिम्मेदारी है -चाहे वह कुछ भी कहे, क्योंकि दर्द और सिर्फ की नज़र में सभी समान हैं।

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